करीब से महसूस कर पाई,
सुनसान राहों की चुप्पी में
खुद को शामिल कर पाई।
बारिश की सौंधी सौंधी महक ने
अपनी उपस्थिति दर्ज कराई,
मेरे स्वप्निल परों को भी मैंने
उड़ने की ख्वाईश जगाई।
राह थी बिल्कुल बेजान
नहीं था उस पर कोई इंसान,
प्रकृति के अनुपम सौंदर्य से
खिल गया था ये संसार।
आसां नहीं इंसां का घर रहना
पशु-पक्षियों का रहा स्वतंत्र विहार,
पिंजरे में था मनुष्य और
खामोशियों में प्रकृति ने सुंदरता पाई।
अद्भुत, अविरल, आनंदित, आलोकित
मदमस्त मौसम आया था,
धीमी धीमी बूंदों में
मन मेरा मंद-मंद मुस्कुराया था।