सोमवार, 24 अगस्त 2020

सुनसान राहें

हवाओं की सरसराहट को 
करीब से महसूस कर पाई,
सुनसान राहों की चुप्पी में
खुद को शामिल कर पाई।

बारिश की सौंधी सौंधी महक ने
अपनी उपस्थिति दर्ज कराई,
मेरे स्वप्निल परों को भी मैंने
उड़ने की ख्वाईश जगाई।

राह थी बिल्कुल बेजान
नहीं था उस पर कोई इंसान,
प्रकृति के अनुपम सौंदर्य से
खिल गया था ये संसार।

आसां नहीं इंसां का घर रहना
पशु-पक्षियों का रहा स्वतंत्र विहार,
पिंजरे में था मनुष्य और
खामोशियों में प्रकृति ने सुंदरता पाई।

अद्भुत, अविरल, आनंदित, आलोकित
मदमस्त मौसम आया था,
धीमी धीमी बूंदों में
मन मेरा मंद-मंद मुस्कुराया था। 


गुरुवार, 13 अगस्त 2020

वक्त

वक्त भी कितना तेज भागता है...

एक वो पल था 
जब लगा था जिंदगी खत्म हो गई है,
पर ना वक्त रुका, ना हम
और ना हमारी जिंदगी।

तेरे साथ ही मेरे सपने, मेरी उड़ान, मेरा वजूद
बस खत्म होता सा नजर आया,
और एक अरसा गुजर गया,
तेरे पीछे-पीछे भागते हुए।

एक ऐसा दौर भी आया जहां,
तुझे याद करके आंसू बहाना
भी प्रतिबंधित था।

आज फिर आजाद हुई  हूं,
जी भरकर रोना चाहती हूं,
हर पल दुख देते अहसासों को
पल में मिटाना चाहती हूं।

इस भागते वक्त में,
कुछ पल अपने लिए गुजारना चाहते हूं।


तेरा मेरा रिश्ता

रूह में बसा रखा है मैंने तुझे,
गर मिल ना भी पाए तो गम नहीं ।

हर पल मेरी बातों में तू है,
बात ना भी हो पाए तो गम नहीं।

तस्वीर बसा रखी है सीने में,
साथ में ना रह पाए तो गम नहीं।

होती थी मैं भी कभी तेरी आदत,
अब मुझे याद भी ना करें तो कोई गम नहीं।

मेरी हर सांस तेरे होने से,
बस ये ही तू समझ पाए, 
तेरी एक पुकार ही 
मेरी मंजिल से कम नहीं।

पुस्तक समीक्षा - कोरे कागज

  अमृता प्रीतम द्वारा लिखित “कोरे कागज” उपन्यास व्यक्ति के अंतर्गत की उथल-पुथल एवं स्वयं के होने की सच्चाई जानने की इच्छा पर आधारित है | उ...