रविवार, 29 मार्च 2026
पुस्तक समीक्षा - 11, अक्टूबर जंक्शन
रविवार, 15 मार्च 2026
पुस्तक समीक्षा - कुफ्र (तहमीना दुर्रानी)
तहमीना दुर्रानी एक
अत्यंत क्रांतिकारी लेखिका है जिन्होंने वर्ष 1991 में अपनी आत्मकथा “माई फ्यूडल लार्ड”
लिखी जो बहुत ही विवादास्पद एवं प्रसिद्ध रही | इस पुस्तक
का 22 भाषाओं में अनुवाद हुआ | इसके पश्चात तहमीना ने अब्दुल
सत्तार इदी की जीवनी “ए मिरर टु द ब्लाइंड” लिखी | ब्लासफेमी
उनकी महत्त्वपूर्ण कृति है जिसका “कुफ्र” नाम से हिंदी अनुवाद हुआ है | यह उपन्यास दक्षिणी पाकिस्तान में स्थित एकज दरगाह के पीरों के नीच कारनामों
की सच्ची कथा पर आधारित है |
इस पाकिस्तानी उपन्यास
में धर्म के नाम पर पाखंड, शोषण, महिला अत्याचार और क्रूर कारनामों का चित्रण किया गया है | आत्मकथात्मक शैली में रचित इस उपन्यास का मुख्य चित्रण हीर का है जो गरीब
परिवार से है एवं उसकी 2 छोटी बहिनें और 1 भाई है | पीर साई (धार्मिक
नेता) जिसे इस्लाम धर्म में खुदा का दर्जा प्राप्त है, अपनी से
आधी उम्र की लड़की हीर के परिवार को लालच देकर उससे शादी करने हेतु मजबूर करता है | इसी शादी से प्रारम्भ होती है, मजहब की आड़ में होने
वाली हैवानियत की एक लंबी कहानी |
तहमीना ने हीर के
माध्यम से एक स्त्री की आंतरिक पीड़ा का वर्णन किया है जिसमें उसके पति को मात्र उसकी
देह से मतलब है और केवल अपनी पत्नी ही नहीं बल्कि हवेली की हर लड़की/स्त्री उसके लिए
मात्र उपभोग की चीज है | हैवानियत तो तब दिखाई देती
है जब अपनी बेटी को भी उसी बुरी नजर से देखता है | हीर को एक
गरीब बेटी, पति की जरूरत को पूरा करती पत्नी, अपनी बेटियों को क्रूर और लालची नजरों से बचाती माँ और अपने ही बेटे से अपमानित
होती स्त्री रूपी किरदार में कुफ्र में विस्तार से बताया गया है |
समाज में पीर साई
को खुदा का दर्जा दिया गया है और हवेली के भीतर उसी के भयावह रूप को दिखाया गया है
जो धर्म की चादर ओढ़कर दिन में लोगों के दु:खों को दूर करता है और रात होते ही हवेली
में रहने वाली पत्नी, बेटी, नौकरानी और उनकी बेटियों को केवल हवस की नजर से देखता है | यह उपन्यास हीर के मानसिक और शारीरिक शोषण की कहानी है जो पीर साई की मृत्यु
की दुआ करती है और सोचती है कि शायद उसकी मृत्यु उसे इस हवेली की घुटन से आजाद करा
सकें और अचानक ही हीर का उसके पूर्व प्रेमी से आमना-सामना हो जाता है | दूसरी ओर पीर साई की क्रूरता को उसके बेटे ने जारी रखा और जिससे हीर का शेष
जीवन भी दशहत और यातनाओं के साये में जीने में मजबूर हो गया |
हालांकि हीर, हवेली और दरगाह के काले सच को तारा (सेविका) की सहायता से बाहर लाने का प्रयास
करती है किन्तु चाहकर भी इस नरक में धँसकर रह जाती है और उसी हवेली में अपने प्राण
त्यागने को मजबूर हो जाती है |
इस उपन्यास का अंत
निश्चित रूप से पाठकों के मन को कुछ राहत देता है | हीर
अपने भाई, बहिन और माँ की सहायता से मरणासन्न अवस्था में हवेली
से बाहर आती है और एक गुमनाम रूप से एक नया जीवन प्रारम्भ करती है | हवेली के लिए हीर हमेशा के लिए मर चुकी है पर वो अपनी कब्र के सामने मुंह
ढकें खड़ी होकर अपनी सभी यातनाओं को याद करते हुए, अपने प्रेमी
के संग अपने शेष जीवन को बिताने की हिम्मत कर चुकी है |
तहमीना दुर्रानी ने
कुफ्र के जरिए दरगाह में पीर साई की वास्तविकता को उजागर करने का साहस किया है जो इस्लामी
धर्म में वर्जित है | यह आत्मकथा निश्चित ही पाठकों
को यातनाओं, अत्याचारों और एक हवेली के अंदर और बाहर एक व्यक्ति
के दोहरे चरित्र को उजागर करने में सफल हुई है |
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