शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

पुस्तक समीक्षा - कोरे कागज

 

अमृता प्रीतम द्वारा लिखित “कोरे कागज” उपन्यास व्यक्ति के अंतर्गत की उथल-पुथल एवं स्वयं के होने की सच्चाई जानने की इच्छा पर आधारित है |

उपन्यास का कथानक अपने नाम पर ही आधारित है जिसके नायक पंकज को अपनी माँ की मृत्यु के दिन पता चलता है कि वह दत्तक पुत्र है | कहानी के अन्य मुख्य पात्र रक्खी मौसी, निधि महाराज है एवं अप्रत्यक्ष रूप से गीता का पात्र भी कहानी से जुड़ा हुआ है |

पंकज जानता है कि रक्खी मौसी और निधि महाराज को उसके जन्म के विषय में सब पता है किन्तु वे पंकज को बता नहीं रहे है | वह अपने वास्तविक माता-पिता के बारे में जानने का बहुत प्रयास करता है, इस प्रयास एवं मानसिक अवसाद में उसे अत्यधिक ज्वर हो जाता है | उपन्यास में पंकज के मन की बेचैनी और जिज्ञासा का विस्तृत रूप दिखाया गया है | इसी के मध्य पारिवारिक संपत्ति के प्रति लालसा में उसके चाचा द्वारा अपनी पुत्रियों को पंकज को आकर्षित करने हेतु बाध्य किया जाता है और रिक्ता (पंकज की कॉलेज सहपाठी) द्वारा पंकज को आत्मीय पत्र लिखा जाता है |

अंत में हरिद्वार में माँ के अस्थि विसर्जन हेतु जाते समय निधि महाराज पंकज को सच्चाई बता देते है कि वह गीता का पुत्र है और जिसे वह अपनी माँ मान रहा था, वो उसकी नानी है | पंकज को पैदा करके अविवाहित गीता गंगा में डूबकर आत्महत्या कर लेती है | यह सच पंकज को झनझोर कर रखा देता है | निधि महाराज द्वारा उसके पिता का सच भी उसे बताया गया और उनकी वर्तमान दयनीय स्थिति भी बताई गई, जिसमें वे नि:संतान, अकेले एवं अपाहिज रूप में अपना जीवन व्यतीत कर रहे है | निधि महाराज पंकज को उसके पिता का लिखा एक पत्र देते है और जो उसके उत्तर का इंतजार कर रहे है | पर पंकज उस पत्र को बिना देखे गंगा में प्रवाहित कर देता है| निधि महाराज के कहने पर भी पंकज अपने पिता (उनके अंतिम दिनों में) से मिलने नहीं जाना चाहता है | वह किंकर्तव्यमूढ़ होकर सोचता है,

जानता हूँ – मैं मोहब्बत की सूरत भी कभी नहीं देख संकूगा, नफरत की सूरत भी कभी नहीं |

लग रहा है – ये दोनों खत शायद मैं जिंदगी में कभी नहीं लिख सकूँगा ...

और इन दोनों खतों के कागज हमेशा के लिए कोरे रह जाएँगे |

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