मुसाफिर कैफे के प्रारम्भ में लेखक दिव्य प्रकाश दुबे की ये पंक्तियाँ उनके लिखने के जुनून को बताती है –
“हम सभी की जिंदगी में कुछ ऐसी कहानियाँ होती है जिन्हें अगर हम न सुनाएँ तो पागल हो जाएंगे | ऐसी ही एक कहानी के नाम |”
ये कहानी भी ऐसे दो किरदारों की है जिनके अपने सपने है, अपनी सोच है – उनका नाम है- सुधा और चंदर | दोनों की पहली मुलाक़ात शादी के लिए एक-दूसरे को देखने के लिए होती है | दोनों शादी नहीं करना चाहते है पर दोनों को अपने-अपने परिवार के लिए मिलना पड़ता है पर दोनों का निर्णय पक्का है कि वे शादी नहीं करेंगे | क्योंकि चंदर का दिल टूटा हुआ है वहीं सुधा डिवोर्स कोर्ट में वकील है और वो रोज रिश्तों को टूटते हुए देखती है इस कारण वो किसी रिश्ते में नहीं बंधना चाहती है |
“हम सभी की जिंदगी में एक लिस्ट होती है | हमारे सपनों की लिस्ट, छोटी-मोटी खुशियों की लिस्ट |”
ये कहानी प्यार, दोस्ती की ही नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक अपने सपनों को पूरा करने की है | दोनों अपनी दोस्ती और आपसी समझ से एक साथ रहना शुरू करते है, जहां सुधा गर्भवती हो जाती है | चंदर सुधा से शादी करना चाहता है पर सुधा अभी भी किसी रिश्ते में बंधने को तैयार नहीं है | सुधा के सपने और उसकी सोच इस साधारण सी प्रेम कहानी को अप्रत्याशित रूप दे देते है | सुधा चंदर के घर पर ही रहती है पर उससे शादी नहीं करना चाहती |
जीवन भी अजीब ही होता है | हमें पता ही नहीं होता कि हमें जीवन में क्या करना है या उससे क्या चाहिए ? बस यही सोच कर खुद के सपने कहीं पीछे रह जाते है |
चंदर इन सब चीजों से बहुत परेशान होकर नौकरी, घर और सुधा को छोड़कर चला जाता है | यही सफर उसे मसूरी ले जाता है, जहाँ उसकी मुलाक़ात पम्मी से होती है और यहीं से शुरू होता है मुसाफिर कैफे |
दस साल बाद फिर से चंदर और सुधा मिलते है जहाँ चंदर अपने बेटे अक्षर से मिलता है | इस कहानी का अंत एक अलग ही आधुनिक सोच के साथ होता है | चंदर, सुधा, पम्मी और अक्षर सभी एक साथ रहने लगते है | अब अक्षर के लिए पम्मी बड़ी मम्मी थी और सुधा मम्मी और मुसाफिर कैफे में सब एक साथ, अपने-अपने सपनों के साथ खुशी-खुशी रहते है |