मंगलवार, 8 सितंबर 2026

पुस्तक समीक्षा- 16 रेत की मछली


कांता भारती (डॉ धर्मवीर भारती की प्रथम पत्नी) द्वारा रचित “रेत की मछली” अत्यंत संवेदनशील एवं मार्मिक उपन्यास है | इस उपन्यास के नामकरण से अभिप्राय है कि जिस प्रकार मछली का जीवन जल है किन्तु जल के अभाव में वह रेत में तड़प-तड़प कर मर जाती है, उसी प्रकार प्रेम, सम्मान के बिना एक स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता है | इस उपन्यास की नायिका कुंतल की स्थिति भी कुछ इसी प्रकार की है जिसके रेत रूपी वैवाहिक जीवन में पानी रूपी प्रेम, सम्मान और प्यार है ही नहीं | जिस कारण वह इस वैवाहिक बंधन में ना जी पा रही है और ना ही मर पा रही है | कांता भारती ने इस उपन्यास की भूमिका में लिखा है, “मेरे लिए इस उपन्यास को लिखना वैसा ही रहा है, जैसे पीड़ा के क्षणों में पूरी आस्था के साथ प्रार्थना करना |”

इस उपन्यास में तीन मुख्य पात्र है – शोभन (नायक), कुंतल (नायिका), मीनल (शोभन की दूर की बहिन) | एक मध्यवर्गीय परिवार की इस कहानी में शोभन और कुंतल का प्रेम विवाह होता है | परिवार में शोभन, उसकी माँ और कुंतल खुशीपूर्वक रह रहे थे किन्तु तभी मीनल उनके घर में रहने आती है | यही से कुंतल की उपेक्षा, घुटन, संघर्ष और अत्याचारों का दौर प्रारम्भ होता है | मानसिक और शारीरिक कष्टों से प्रताड़ित कुंतल अपने आँखों के समक्ष वह सब कुछ देखने को विवश हो जाती है जिसे एक वैवाहित स्त्री सोच भी नहीं सकती | इसी शोभन के प्यार में आकर कुंतल ने अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी की थी | इसी आशा के साथ कुंतल यह सब अमानवीयता भी सहन करती रहती थी कि शायद शोभन सुधर जाएगा या पिता बनने पर यह सब छोड़ देगा | पर क्रूरता की हद तब होती है, जब मुंबई स्थानांतरण के पश्चात शोभन, मीनल के साथ एक घर में रहना शुरू कर देता है और कुंतल से पीछा छुड़वाने के लिए उस पर चरित्रहीनता का आरोप लगा देता है| कुंतल अंतिम समय तक अपने रिश्ते को बचाने का प्रयास करती है परंतु शोभन तो उसे बहुत पहले ही मानसिक, शारीरिक और आत्मिक रूप से विस्मृत कर चुका था |

कुंतल को एक निर्बल नारी कहना गलत होगा, वह तो सहनशीलता के पराकाष्ठा की मूर्त है वह अपने पति को परस्त्री के साथ नितांत व्यक्तिगत पलों को देखने के लिए विवश हो जाती है | इस आघात को सहन करने के बाद भी वह शोभन के साथ ही रहती है | कुंतल जितना साहस इस युग में शायद ही कोई स्त्री कर सकती है | इस असहनीय दु:ख के साथ भी उसकी परीक्षा खत्म नहीं होती और अंत में उसे अपनी बेटी को भी शोभन को देना पड़ता है | 

यह उपन्यास समाज के लिए एक दर्पण है जहाँ समाज में एक ओर नारी सशक्तिकरण की बात होती है वही दूसरी ओर पुरुष द्वारा अपनी पत्नी और बेटी को मानसिक एवं शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है | लेखिका ने अपनी लेखनी से एक ऐसी कथा को पाठकों के समक्ष रखा है जो हम सभी के मध्य कहीं ना कहीं घट रही है पर सहनशीलता और त्याग के बदले में उस स्त्री को चरित्रहीन साबित कर दिया जाता है | एक वैवाहित स्त्री के लिए उसका पति और बच्चा ही जीवन होता है पर कुंतल से तो उसके दोनों स्तम्भ छीन लिए गए |

यातनाओं, पीड़ाओं, द्वन्द्वों से गुजरती कुंतल, समाज के समक्ष एक प्रश्न उत्पन्न करती है कि पूजनीय नारी की इस दयनीय अवस्था का जिम्मेदार कौन है ? उसका पति या ये समाज, जिसने एक पुरुष को ये सब करने का अधिकार दिया | पुरुष के लिए समाज द्वारा कोई नियम नहीं बनाए गए | इस प्रश्न पर चिंतन-मनन करने और इसका हल निकालने की आवश्यकता है |


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