दुबे जी की कहानियां आम व्यक्ति के जीवन, रिश्तों और सामाजिक परिवर्तनों पर केंद्रित होती है। उनकी भाषा सरल, सहज एवं संवादात्मक होती है जो सीधे रूप से पाठकों के हृदय को स्पर्श करती है।
अक्टूबर जंक्शन उपन्यास में लेखक ने आपसी समन्वय, विचारों की स्वतंत्रता और भावनाओं का ऐसा ताना-बाना बुना है जिसमें दो व्यक्ति अलग अलग होकर भी एक दूसरे से जुड़े हुए है जिस कारण भौगोलिक दूरी और मोबाईल से निरंतर संपर्क में ना रहना भी मायने नहीं रखता है।
यह कहानी 10 अक्टूबर 2020 की एक प्रेस कॉन्फ्रेस से प्रारंभ होती है जो दिल्ली में होती है जहां उपन्यास के मुख्य किरदार चित्रा से परिचय करवाया जाता है और कहानी सीधे 10 साल पीछे चली जाती है।
यह कहानी है बनारस की, जो इंसान को जीवन और मृत्यु के वास्तविक सत्य से रूबरू कराती है और अंत:करण को एक शांति प्रदान करती है। इसी बनारस के प्रसिद्ध पिज्जेरिया कैफे में चित्रा और सुदीप की पहली मुलाकात होती है जहां टेबल खाली नहीं होने पर वेटर उन्हें एक ही टेबल पर बैठा देता है। सुदीप एक यूथ आइकॉन है जो बुक माय ट्रिप नाम की स्टार्ट अप कंपनी की सीईओ है। चित्रा एक लेखिका है जो पेज थ्री सेलिब्रिटी बनना चाहती है। कैफे के बाद बनारस के अस्सी घाट पर मुलाकात, पावन गंगा नदी की नाव पर सवारी आदि इस कहानी को खास बना देते है।
इस उपन्यास में केवल अक्टूबर महीने का ही नहीं वरन् 10 वर्षों की कहानी है। जिसमें प्रत्येक वर्ष 10 अक्टूबर को चित्रा और सुदीप मिलते है। दोनों का साल में एक दिन मिलना और उस दिन सिर्फ एक दूसरे के साथ रहना ये अहसास दोनों के रिश्ते को बहुत खास बना देता है।
*हम सबके अंदर एक किताब होती है। वो बात जो समंदर के किनारे टहलते हुए सबसे पहले आकर पैर से टकराती है।*
इस समय में चित्रा एक प्रसिद्ध लेखिका बन जाती है और नाटकीय रूप से सुरभि परासर का नाम एक प्रसिद्ध लेखिका के रूप में आता है। सुदीप का इस दुनिया से चले जाना, सुरभि परासर का लेखिका रूप, घाट वाले बाबा के वो शब्द, "तू ध्यान से देख वो कहीं नहीं गया, तेरे अंदर है। आधी तू आधा वो।"
और अंतिम सत्य "अकेले हो जाना ही इस दुनिया का आखिरी सत्य है। भले ही आप भीड़ में मरे या अपने घर के बिस्तर पर, हर आदमी मरते वक्त अकेला ही होता है।"
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