मंगलवार, 8 नवंबर 2022

समय की डोर

बहुत पाया है तुझसे ए वक्त
पर चाहने का दौर रुका ही नहीं,
तूने कुछ दिया और कुछ लिया
पर लेने का दुख थमा ही नहीं।

है नहीं मेरा यहां कुछ भी
ये मर्म समझ आया ही नहीं,
खुद को पाने की राह पर
मैं कभी चल पाया ही नहीं।

वक्त निकालने का कहकर
मैं तुझे समझ पाया ही नहीं,
सब्र के इस कोलाहल को
मैं कभी तोड़ पाया ही नहीं।

रुकसत होने का जब समय आया
मैं खुद को अलग कर पाया ही नहीं,
चकनाचूर होकर ये ख्याल आया
ए वक्त मैं तुझे कभी समझ पाया ही नहीं।

सोना

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