शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

पुस्तक समीक्षा - कोरे कागज

 

अमृता प्रीतम द्वारा लिखित “कोरे कागज” उपन्यास व्यक्ति के अंतर्गत की उथल-पुथल एवं स्वयं के होने की सच्चाई जानने की इच्छा पर आधारित है |

उपन्यास का कथानक अपने नाम पर ही आधारित है जिसके नायक पंकज को अपनी माँ की मृत्यु के दिन पता चलता है कि वह दत्तक पुत्र है | कहानी के अन्य मुख्य पात्र रक्खी मौसी, निधि महाराज है एवं अप्रत्यक्ष रूप से गीता का पात्र भी कहानी से जुड़ा हुआ है |

पंकज जानता है कि रक्खी मौसी और निधि महाराज को उसके जन्म के विषय में सब पता है किन्तु वे पंकज को बता नहीं रहे है | वह अपने वास्तविक माता-पिता के बारे में जानने का बहुत प्रयास करता है, इस प्रयास एवं मानसिक अवसाद में उसे अत्यधिक ज्वर हो जाता है | उपन्यास में पंकज के मन की बेचैनी और जिज्ञासा का विस्तृत रूप दिखाया गया है | इसी के मध्य पारिवारिक संपत्ति के प्रति लालसा में उसके चाचा द्वारा अपनी पुत्रियों को पंकज को आकर्षित करने हेतु बाध्य किया जाता है और रिक्ता (पंकज की कॉलेज सहपाठी) द्वारा पंकज को आत्मीय पत्र लिखा जाता है |

अंत में हरिद्वार में माँ के अस्थि विसर्जन हेतु जाते समय निधि महाराज पंकज को सच्चाई बता देते है कि वह गीता का पुत्र है और जिसे वह अपनी माँ मान रहा था, वो उसकी नानी है | पंकज को पैदा करके अविवाहित गीता गंगा में डूबकर आत्महत्या कर लेती है | यह सच पंकज को झनझोर कर रखा देता है | निधि महाराज द्वारा उसके पिता का सच भी उसे बताया गया और उनकी वर्तमान दयनीय स्थिति भी बताई गई, जिसमें वे नि:संतान, अकेले एवं अपाहिज रूप में अपना जीवन व्यतीत कर रहे है | निधि महाराज पंकज को उसके पिता का लिखा एक पत्र देते है और जो उसके उत्तर का इंतजार कर रहे है | पर पंकज उस पत्र को बिना देखे गंगा में प्रवाहित कर देता है| निधि महाराज के कहने पर भी पंकज अपने पिता (उनके अंतिम दिनों में) से मिलने नहीं जाना चाहता है | वह किंकर्तव्यमूढ़ होकर सोचता है,

जानता हूँ – मैं मोहब्बत की सूरत भी कभी नहीं देख संकूगा, नफरत की सूरत भी कभी नहीं |

लग रहा है – ये दोनों खत शायद मैं जिंदगी में कभी नहीं लिख सकूँगा ...

और इन दोनों खतों के कागज हमेशा के लिए कोरे रह जाएँगे |

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

पुस्तक समीक्षा- 16 रेत की मछली


कांता भारती (डॉ धर्मवीर भारती की प्रथम पत्नी) द्वारा रचित “रेत की मछली” अत्यंत संवेदनशील एवं मार्मिक उपन्यास है | इस उपन्यास के नामकरण से अभिप्राय है कि जिस प्रकार मछली का जीवन जल है किन्तु जल के अभाव में वह रेत में तड़प-तड़प कर मर जाती है, उसी प्रकार प्रेम, सम्मान के बिना एक स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता है | इस उपन्यास की नायिका कुंतल की स्थिति भी कुछ इसी प्रकार की है जिसके रेत रूपी वैवाहिक जीवन में पानी रूपी प्रेम, सम्मान और प्यार है ही नहीं | जिस कारण वह इस वैवाहिक बंधन में ना जी पा रही है और ना ही मर पा रही है | कांता भारती ने इस उपन्यास की भूमिका में लिखा है, “मेरे लिए इस उपन्यास को लिखना वैसा ही रहा है, जैसे पीड़ा के क्षणों में पूरी आस्था के साथ प्रार्थना करना |”

इस उपन्यास में तीन मुख्य पात्र है – शोभन (नायक), कुंतल (नायिका), मीनल (शोभन की दूर की बहिन) | एक मध्यवर्गीय परिवार की इस कहानी में शोभन और कुंतल का प्रेम विवाह होता है | परिवार में शोभन, उसकी माँ और कुंतल खुशीपूर्वक रह रहे थे किन्तु तभी मीनल उनके घर में रहने आती है | यही से कुंतल की उपेक्षा, घुटन, संघर्ष और अत्याचारों का दौर प्रारम्भ होता है | मानसिक और शारीरिक कष्टों से प्रताड़ित कुंतल अपने आँखों के समक्ष वह सब कुछ देखने को विवश हो जाती है जिसे एक वैवाहित स्त्री सोच भी नहीं सकती | इसी शोभन के प्यार में आकर कुंतल ने अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी की थी | इसी आशा के साथ कुंतल यह सब अमानवीयता भी सहन करती रहती थी कि शायद शोभन सुधर जाएगा या पिता बनने पर यह सब छोड़ देगा | पर क्रूरता की हद तब होती है, जब मुंबई स्थानांतरण के पश्चात शोभन, मीनल के साथ एक घर में रहना शुरू कर देता है और कुंतल से पीछा छुड़वाने के लिए उस पर चरित्रहीनता का आरोप लगा देता है| कुंतल अंतिम समय तक अपने रिश्ते को बचाने का प्रयास करती है परंतु शोभन तो उसे बहुत पहले ही मानसिक, शारीरिक और आत्मिक रूप से विस्मृत कर चुका था |

कुंतल को एक निर्बल नारी कहना गलत होगा, वह तो सहनशीलता के पराकाष्ठा की मूर्त है वह अपने पति को परस्त्री के साथ नितांत व्यक्तिगत पलों को देखने के लिए विवश हो जाती है | इस आघात को सहन करने के बाद भी वह शोभन के साथ ही रहती है | कुंतल जितना साहस इस युग में शायद ही कोई स्त्री कर सकती है | इस असहनीय दु:ख के साथ भी उसकी परीक्षा खत्म नहीं होती और अंत में उसे अपनी बेटी को भी शोभन को देना पड़ता है | 

यह उपन्यास समाज के लिए एक दर्पण है जहाँ समाज में एक ओर नारी सशक्तिकरण की बात होती है वही दूसरी ओर पुरुष द्वारा अपनी पत्नी और बेटी को मानसिक एवं शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है | लेखिका ने अपनी लेखनी से एक ऐसी कथा को पाठकों के समक्ष रखा है जो हम सभी के मध्य कहीं ना कहीं घट रही है पर सहनशीलता और त्याग के बदले में उस स्त्री को चरित्रहीन साबित कर दिया जाता है | एक वैवाहित स्त्री के लिए उसका पति और बच्चा ही जीवन होता है पर कुंतल से तो उसके दोनों स्तम्भ छीन लिए गए |

यातनाओं, पीड़ाओं, द्वन्द्वों से गुजरती कुंतल, समाज के समक्ष एक प्रश्न उत्पन्न करती है कि पूजनीय नारी की इस दयनीय अवस्था का जिम्मेदार कौन है ? उसका पति या ये समाज, जिसने एक पुरुष को ये सब करने का अधिकार दिया | पुरुष के लिए समाज द्वारा कोई नियम नहीं बनाए गए | इस प्रश्न पर चिंतन-मनन करने और इसका हल निकालने की आवश्यकता है |


बुधवार, 8 जुलाई 2026

पुस्तक समीक्षा - 15 नदी के द्वीप – अज्ञेय

नदी के द्वीप “अज्ञेय” द्वारा रचित एक मनोवैज्ञानिक एवं बौद्धिक उपन्यास है | उपन्यास के नाम में नदी सांकेतिक रूप से समाज एवं द्वीप व्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है | द्वीप और नदी एक-दूसरे से जुड़े हुए है | नदी चाहे किसी भी द्वीप को अपने अंदर समाहित कर लें पर द्वीप नदी को समाहित नहीं कर सकता है उसी प्रकार व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है, उसे इसी समाज की धारा में निरंतर बहते हुए चले जाना है |

इस उपन्यास में मुख्य रूप से चार केंद्रीय पात्र है - रेखा, भुवन, गौरा और चंद्रमाधव | हेमेन्द्र और डॉ रमेशचन्द्र के पात्र की भूमिका कम अवश्य है किन्तु कहानी के प्रवाह में आवश्यक प्रतीत होता है | रेखा एक आत्मनिर्भर, साहसी एवं पढ़ी-लिखी महिला है जो हेमेन्द्र से अलग होने पर अपना जीवन अपने अनुसार व्यतीत कर रही है| चंद्रमाधव के यहाँ रेखा की मुलाक़ात, उसके दोस्त भुवन से होती है जो एक वैज्ञानिक है और कास्मिक रश्मियों के अन्वेषण में व्यस्त रहता है | चंद्रमाधव जो कि एक पत्रकार है एवं उसके कहने पर भुवन लखनऊ आता है | इसी मुलाक़ात में भुवन और रेखा एक-दूसरे के विचारों से प्रभावित होते है | यद्यपि चंद्रमाधव रेखा के पति हेमेन्द्र का मित्र है और वैवाहित है किन्तु वह रेखा की ओर आकर्षित होता है जिसमें रेखा की अस्वीकृति होती है |

इस प्रकार कहानी का प्रवाह, एक और पात्र गौरा का परिचय करवाता है जिसे भुवन बचपन में पढाता था और उसे जीवन का एक लक्ष्य देता है | गौरा एक सहृदय, संस्कारी, अंतर्मुखी और शिक्षित महिला है | कहानी इन तीन पात्रों के इर्द-गिर्द चलती है जहाँ मित्रता-प्रेम-समर्पण-त्याग सब एक साथ चलते है और इनमें भिन्नता करना मुश्किल हो जाता है | किन्तु सभी पात्र एक-दूसरे से पत्र के माध्यम से जुड़े हुए है |

रेखा, भुवन का नजदीक आना, रेखा के विवाह प्रस्ताव पर भुवन की चुप्पी, रेखा का गर्भपात करवाना, भुवन का खुद को दोषी मानना, गौरा का मौन प्रेम, भुवन की कशमशकता, रेखा का पुर्नविवाह, भुवन का अपने आंतरिक विचारों को पहचानना और गौरा के प्रति प्रेम को जानना आदि मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से पूर्ण है | जो व्यक्ति के मन की उलझनों को भावों में पिरोकर एक परिपक्व समझ प्रस्तुत करता है | व्यक्ति सामाजिक जीवन जीते हुए भी पूर्णतया स्वतंत्रता चाहता है, किसी अनायास परिणाम को जानकर भी स्वयं को बांधना नहीं चाहता है | यही स्थिति उनके शब्दों में भी परिलक्षित होती है  | जब रेखा भुवन को कहती है, "दूसरों की बनायी हुई लीकों की बात मैं नहीं सोच रही हूँ | व्यक्तित्व की अपनी लीकें होती हैं- एक रुझान होता है |"

जब भुवन के साथ एक विशेष क्षण साझा करने के बाद रेखा की उक्ति "आई एम फुलफील्ड | अब अगर मैं मर जाऊँ तो परमात्मा के प्रति-प्रकृति के प्रति - यह आक्रोश लेकर नहीं जाऊँगी कि मैंने कोई भी फुलफिलमेंट नहीं जाना - कृतज्ञ भाव ही लेकर जाऊँगी, परमात्मा के प्रति और भुवन तुम्हारे प्रति |"

रेखा के द्वारा विवाह प्रस्ताव पर भुवन का कोई जवाब ना मिलने पर रेखा का आत्मिक निर्णय- "मैंने तुमसे प्यार मांगा था, तुम्हारा भविष्य नहीं मांगा था|"

गौरा की वह निष्काम अभिव्यक्ति जिसमें अपने प्रेम-स्नेह रूपी भुवन को शिशु कहकर संबोधित किया- "सचमुच मेरे जीवन का सबसे बड़ा इष्ट यही है कि तुम्हें सुखी देख सकूँ- तुम्हारा वरण ठीक कर सकूँ | मेरे स्नेह शिशु, मैं तुम्हारे ही लिए जीती हूँ क्योंकि तुममें जीती हूँ |"

सचमुच अज्ञेय ने मनुष्य के भीतर व्याप्त विचारों और संवेदनाओं को इन पात्रों के माध्यम से प्रकट किया है जहाँ रेखा और गौरा दोनों भुवन के प्रति आकर्षित है, दोनों अत्यंत संवेदनशील है और त्याग एवं समर्पण हेतु तत्पर है | वहीं भुवन परिस्थितियों के अनुसार कार्य करता है किन्तु निर्णय लेने का साहस नहीं कर पाता है जिस कारण स्वयं को समर्पित करती हुई रेखा गर्भपात का फैसला लेकर भुवन को हर बंधन से स्वतंत्र कर देती है |

मिलन-विरह, प्रेम-त्याग, विचार-जज़्बात आदि संवेदनाओं से परिपूर्ण यह उपन्यास सहृदय पाठकों के अंत:करण को अवश्य ही प्रभावित करता है | पत्रों के सिलसिले के माध्यम से पात्रों के मध्य भावनाओं और विचारों का आदान-प्रदान गहन सोच और समझ का प्रतीक है |


सोमवार, 29 जून 2026

पुस्तक समीक्षा- 14, चित्रलेखा

 

भगवतीचरण वर्मा द्वारा रचित चित्रलेखा एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है जिसके सभी पात्र परिस्थितिजन्य अपने मन और मस्तिष्क के अनुसार निर्णय लेते है | यह उपन्यास महाप्रभु रत्नाम्बर के दो शिष्य श्वेतांक और विशालदेव के प्रश्न “पाप क्या है और पुण्य क्या है?’ से प्रारम्भ होता है और जिसका उत्तर पाने के लिए गुरु द्वारा दोनों शिष्यों को अलग-अलग स्वभाव के व्यक्तियों के पास भेजा जाता है |

वहाँ बीजगुप्त और कुमारगिरि क्रमश: वासना और अध्यात्म के प्रतीक है | श्वेतांक बीजगुप्त के साथ और विशालदेव कुमारगिरि के शिष्य के रूप में समय व्यतीत करते है और अपने प्रश्नों का उत्तर जानने का प्रयास करते है | किन्तु दोनों शिष्यों पाप-पुण्य, प्रेम-वासना में अंतर जानने हेतु जिझासु रहते है |

किन्तु प्रेम और वासना में अंतर कठिन लगता है तभी कहा है, “ प्रेम और वासना में भेद है, केवल इतना की वासना पागलपन है जो क्षणिक है, इसलिए वासना पागलपन के साथ ही दूर हो जाती है और प्रेम गंभीर है, उसका अस्तित्व शीघ्र नहीं मिटता |

उपन्यास का मुख्य चरित्र चित्रलेखा है जो प्रेम को साधना, तपस्या और समर्पण का रूप मानती है | जिसके वैधव्य जीवन में सर्वप्रथम कृष्णादित्य, फिर बीजगुप्त और फिर कुमारगिरि आते है | चित्रलेखा द्वारा परिस्थितिवश लिया गया फैसला, उसकी तत्कालीन मनोदशा का परिचायक है जिसमें वो अपने क्षणिक आकर्षण हेतु अपना ही अहित कर लेती है |

पूरा उपन्यास उचित-अनुचित, सही-गलत के मध्य एक प्रश्नचिह्न उत्पन्न करता है | जैसे एक सुंदर बगीचा यशोधरा को अनुपम आनंद और प्रकृति का विहंगम दृश्य नजर आता है वहीं बीजगुप्त को वही बगीचा कृत्रिम लगता है जिसके लिए दिए गए तर्कों से यशोधरा भी सहमत हो जाती है | उपन्यास बीजगुप्त के भौतिक संसार की वासना में लिप्त एवं कुमारगिरि का साधना में रत रहने से प्रारम्भ होता है और अंत में कुमारगिरि प्रेमवासना में ग्रस्त हो, चित्रलेखा को पाने के लिए असत्य वचन का भी प्रयोग करता है वहीं बीजगुप्त वैराग्य की ओर कदम बढ़ा लेता है |अब ऐसी स्थिति में पाप क्या है और पुण्य क्या है? इस प्रश्न का उत्तर प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है |

महाप्रभु रत्नाम्बर की सारगर्भित टिप्पणी इस प्रश्न का सार्थक उत्तर देने में सफल हुई है, " संसार में पाप कुछ भी नहीं हैं, यह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम हैं| हम न केवल पाप करते है और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है |"

पुस्तक समीक्षा- 13, महाभोज

 

महाभोज में मन्नू भंडारी ने राजनीति और नौकरशाही के दांव-पेचों को इस तरह से उकेरा है कि प्रत्येक आगे बढ़ता पृष्ठ एक जाल की भांति उलझता जाता है किन्तु इसी जाल के सृजक दा साहब जो शांत और मुस्कान लिए अपने इशारों पर काम करवाते जाते है और जनता, सत्तारूढ़ और विद्रोही पार्टी में अपने मसीहा की तलाश करती रह जाती है |

यदि कोई इस विद्रोह के विरुद्ध आवाज उठाने की कोशिश भी करता है तो बिसू, बिंदा, सक्सेना और लोचन के समान उसे कुचल दिया जाता है | दत्ता साहब और डी.आई.जी. केवल अपने लाभ के लिए आम जनता को गुमराह करने के लिए तैयार है | ऐसे में उपन्यास की यह पंक्ति इंसानियत की पैरवी अवश्य करती है कि “आदमी का दुख जिस दिन पैसे से दूर होने लगेगा, इंसानियत उठ जाएगी दुनिया से |”

मन्नू भंडारी यह उपन्यास निश्चित रूप से सोचने पर विवश करता है कि इस लोकतान्त्रिक देश में लोगों की क्या अहमियत रह गई है? जनता केवल कठपुतलियों की तरह काम करती है, जिसे जैसे चाहे वैसे नचाया जा सकता है | यही राजनीति है जहां खोटे सिक्के समाज चला रहे है और खरे सिक्के एक तरफ फेंक दिए गए है |

यह उपन्यास समाज की कुत्सित राजनीति का दर्पण है जिसमें सरोहा गाँव के दलित युवक बिसू की संदिग्ध हत्या पर राजनीति कर उसे चुनाव जीतने का माध्यम बनाया गया है | यहाँ मीडिया से लेकर पुलिस-प्रशासन सब लाचार या कठपुतली की तरह नजर आते है |

यह उपन्यास नेताओं के सतारुद्ध रहने के लिए किए गए साम-दाम-दंड-भेद का उपयोग कर किए नैतिक पतन और जनता के शारीरिक और मानसिक शोषण का परिचायक है | इस उपन्यास का नामकरण महाभोज एक व्यंग्य है जिसमें राजनैतिक फायदे के लिए की गई लोगों की हत्या किसी दुख की वजह नहीं वरन केवल महाभोज अर्थात सत्ता की खुशी का कारण होती है |

गुरुवार, 28 मई 2026

खुद की ही बात

जब बैठती हूँ तन्हां मैं
खुद से खुद की ही बात करती हूँ,
बदले मौसम की तरह वक्त को
सामने रख हिसाब करती हूँ।

सपना मिला ना ही मोहब्बत
अपने दर्द का कारण ढूंढती हूँ,
मिली जिसे मैं ना,
वो है परेशान या मैं, ये सोच
खुद को आईने में बार-बार देखती हूँ।

एक सपना था कि
उडू आसमाँ में,
अपने पंखों के वो निशान खोजती हूँ
पर खुद को पिंजरे की जकड़ में देखती हूँ।

मिलना, बिछड़ना तो चलता है संसार में
मैं बस मिलन का अहसास खोजती हूँ,
घूमेगा पहिया एक दिन मेरा भी
उस दिन का इंतजार करती हूँ।

खुद को आईने में बार-बार देखती हूँ,
अपने होने की बस वजह ढूंढती हूँ।

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

मुसाफिर कैफे - पुस्तक समीक्षा

 मुसाफिर कैफे के प्रारम्भ में लेखक दिव्य प्रकाश दुबे की ये पंक्तियाँ उनके लिखने के जुनून को बताती है –

“हम सभी की जिंदगी में कुछ ऐसी कहानियाँ होती है जिन्हें अगर हम न सुनाएँ तो पागल हो जाएंगे | ऐसी ही एक कहानी के नाम |”

ये कहानी भी ऐसे दो किरदारों की है जिनके अपने सपने है, अपनी सोच है – उनका नाम है- सुधा और चंदर | दोनों की पहली मुलाक़ात शादी के लिए एक-दूसरे को देखने के लिए होती है | दोनों शादी नहीं करना चाहते है पर दोनों को अपने-अपने परिवार के लिए मिलना पड़ता है पर दोनों का निर्णय पक्का है कि वे शादी नहीं करेंगे | क्योंकि चंदर का दिल टूटा हुआ है वहीं सुधा डिवोर्स कोर्ट में वकील है और वो रोज रिश्तों को टूटते हुए देखती है इस कारण वो किसी रिश्ते में नहीं बंधना चाहती है |

“हम सभी की जिंदगी में एक लिस्ट होती है | हमारे सपनों की लिस्ट, छोटी-मोटी खुशियों की लिस्ट |”

ये कहानी प्यार, दोस्ती की ही नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक अपने सपनों को पूरा करने की है | दोनों अपनी दोस्ती और आपसी समझ से एक साथ रहना शुरू करते है, जहां सुधा गर्भवती हो जाती है | चंदर सुधा से शादी करना चाहता है पर सुधा अभी भी किसी रिश्ते में बंधने को तैयार नहीं है | सुधा के सपने और उसकी सोच इस साधारण सी प्रेम कहानी को अप्रत्याशित रूप दे देते है | सुधा चंदर के घर पर ही रहती है पर उससे शादी नहीं करना चाहती |

जीवन भी अजीब ही होता है | हमें पता ही नहीं होता कि हमें जीवन में क्या करना है या उससे क्या चाहिए ? बस यही सोच कर खुद के सपने कहीं पीछे रह जाते है |

चंदर इन सब चीजों से बहुत परेशान होकर नौकरी, घर और सुधा को छोड़कर चला जाता है | यही सफर उसे मसूरी ले जाता है, जहाँ उसकी मुलाक़ात पम्मी से होती है और यहीं से शुरू होता है मुसाफिर कैफे |

दस साल बाद फिर से चंदर और सुधा मिलते है जहाँ चंदर अपने बेटे अक्षर से मिलता है | इस कहानी का अंत एक अलग ही आधुनिक सोच के साथ होता है | चंदर, सुधा, पम्मी और अक्षर सभी एक साथ रहने लगते है | अब अक्षर के लिए पम्मी बड़ी मम्मी थी और सुधा मम्मी और मुसाफिर कैफे में सब एक साथ, अपने-अपने सपनों के साथ खुशी-खुशी रहते है |


रविवार, 29 मार्च 2026

पुस्तक समीक्षा - 11, अक्टूबर जंक्शन

दिव्य प्रकाश दुबे, एक बहुत ही चर्चित एवं प्रसिद्ध भारतीय लेखक है। उनकी सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तकों में मसाला चाय, मुसाफिर कैफे, इब्रेबतूती, आको -बाको और यार पापा है। उन्होंने फिल्मों के लिए हिंदी संवाद भी लिखें है और story Baazi, Puja Malik Chowk शो के संवाद लिखे है। 
दुबे जी की कहानियां आम व्यक्ति के जीवन, रिश्तों और सामाजिक परिवर्तनों पर केंद्रित होती है। उनकी भाषा सरल, सहज एवं संवादात्मक होती है जो सीधे रूप से पाठकों के हृदय को स्पर्श करती है।
अक्टूबर जंक्शन उपन्यास में लेखक ने आपसी समन्वय, विचारों की स्वतंत्रता और भावनाओं का ऐसा ताना-बाना बुना है जिसमें दो व्यक्ति अलग अलग होकर भी एक दूसरे से जुड़े हुए है जिस कारण भौगोलिक दूरी और मोबाईल से निरंतर संपर्क में ना रहना भी मायने नहीं रखता है।
यह कहानी 10 अक्टूबर 2020 की एक प्रेस कॉन्फ्रेस से प्रारंभ होती है जो दिल्ली में होती है जहां उपन्यास के मुख्य किरदार चित्रा से परिचय करवाया जाता है और कहानी सीधे 10 साल पीछे चली जाती है।
यह कहानी है बनारस की, जो इंसान को जीवन और मृत्यु के वास्तविक सत्य से रूबरू कराती है और अंत:करण को एक शांति प्रदान करती है। इसी बनारस के प्रसिद्ध पिज्जेरिया कैफे में चित्रा और सुदीप की पहली मुलाकात होती है जहां टेबल खाली नहीं होने पर वेटर उन्हें एक ही टेबल पर बैठा देता है। सुदीप एक यूथ आइकॉन है जो बुक माय ट्रिप नाम की स्टार्ट अप कंपनी की सीईओ है। चित्रा एक लेखिका है जो पेज थ्री सेलिब्रिटी बनना चाहती है। कैफे के बाद बनारस के अस्सी घाट पर मुलाकात, पावन गंगा नदी की नाव पर सवारी आदि इस कहानी को खास बना देते है।
इस उपन्यास में केवल अक्टूबर महीने का ही नहीं वरन् 10 वर्षों की कहानी है। जिसमें प्रत्येक वर्ष 10 अक्टूबर को चित्रा और सुदीप मिलते है। दोनों का साल में एक दिन मिलना और उस दिन सिर्फ एक दूसरे के साथ रहना ये अहसास दोनों के रिश्ते को बहुत खास बना देता है।
*हम सबके अंदर एक किताब होती है। वो बात जो समंदर के किनारे टहलते हुए सबसे पहले आकर पैर से टकराती है।*
इस समय में चित्रा एक प्रसिद्ध लेखिका बन जाती है और नाटकीय रूप से सुरभि परासर का नाम एक प्रसिद्ध लेखिका के रूप में आता है। सुदीप का इस दुनिया से चले जाना, सुरभि परासर का लेखिका रूप, घाट वाले बाबा के वो शब्द, "तू ध्यान से देख वो कहीं नहीं गया, तेरे अंदर है। आधी तू आधा वो।"
और अंतिम सत्य "अकेले हो जाना ही इस दुनिया का आखिरी सत्य है। भले ही आप भीड़ में मरे या अपने घर के बिस्तर पर, हर आदमी मरते वक्त अकेला ही होता है।"

रविवार, 15 मार्च 2026

पुस्तक समीक्षा - कुफ्र (तहमीना दुर्रानी)

 


तहमीना दुर्रानी एक अत्यंत क्रांतिकारी लेखिका है जिन्होंने वर्ष 1991 में अपनी आत्मकथा “माई फ्यूडल लार्ड” लिखी जो बहुत ही विवादास्पद एवं प्रसिद्ध रही | इस पुस्तक का 22 भाषाओं में अनुवाद हुआ | इसके पश्चात तहमीना ने अब्दुल सत्तार इदी की जीवनी “ए मिरर टु द ब्लाइंड” लिखी | ब्लासफेमी उनकी महत्त्वपूर्ण कृति है जिसका “कुफ्र” नाम से हिंदी अनुवाद हुआ है | यह उपन्यास दक्षिणी पाकिस्तान में स्थित एकज दरगाह के पीरों के नीच कारनामों की सच्ची कथा पर आधारित है |

इस पाकिस्तानी उपन्यास में धर्म के नाम पर पाखंड, शोषण, महिला अत्याचार और क्रूर कारनामों का चित्रण किया गया है | आत्मकथात्मक शैली में रचित इस उपन्यास का मुख्य चित्रण हीर का है जो गरीब परिवार से है एवं उसकी 2 छोटी बहिनें और 1 भाई है | पीर साई (धार्मिक नेता) जिसे इस्लाम धर्म में खुदा का दर्जा प्राप्त है, अपनी से आधी उम्र की लड़की हीर के परिवार को लालच देकर उससे शादी करने हेतु मजबूर करता है | इसी शादी से प्रारम्भ होती है, मजहब की आड़ में होने वाली हैवानियत की एक लंबी कहानी |

तहमीना ने हीर के माध्यम से एक स्त्री की आंतरिक पीड़ा का वर्णन किया है जिसमें उसके पति को मात्र उसकी देह से मतलब है और केवल अपनी पत्नी ही नहीं बल्कि हवेली की हर लड़की/स्त्री उसके लिए मात्र उपभोग की चीज है | हैवानियत तो तब दिखाई देती है जब अपनी बेटी को भी उसी बुरी नजर से देखता है | हीर को एक गरीब बेटी, पति की जरूरत को पूरा करती पत्नी, अपनी बेटियों को क्रूर और लालची नजरों से बचाती माँ और अपने ही बेटे से अपमानित होती स्त्री रूपी किरदार में कुफ्र में विस्तार से बताया गया है |

समाज में पीर साई को खुदा का दर्जा दिया गया है और हवेली के भीतर उसी के भयावह रूप को दिखाया गया है जो धर्म की चादर ओढ़कर दिन में लोगों के दु:खों को दूर करता है और रात होते ही हवेली में रहने वाली पत्नी, बेटी, नौकरानी और उनकी बेटियों को केवल हवस की नजर से देखता है | यह उपन्यास हीर के मानसिक और शारीरिक शोषण की कहानी है जो पीर साई की मृत्यु की दुआ करती है और सोचती है कि शायद उसकी मृत्यु उसे इस हवेली की घुटन से आजाद करा सकें और अचानक ही हीर का उसके पूर्व प्रेमी से आमना-सामना हो जाता है | दूसरी ओर पीर साई की क्रूरता को उसके बेटे ने जारी रखा और जिससे हीर का शेष जीवन भी दशहत और यातनाओं के साये में जीने में मजबूर हो गया |

हालांकि हीर, हवेली और दरगाह के काले सच को तारा (सेविका) की सहायता से बाहर लाने का प्रयास करती है किन्तु चाहकर भी इस नरक में धँसकर रह जाती है और उसी हवेली में अपने प्राण त्यागने को मजबूर हो जाती है |

इस उपन्यास का अंत निश्चित रूप से पाठकों के मन को कुछ राहत देता है | हीर अपने भाई, बहिन और माँ की सहायता से मरणासन्न अवस्था में हवेली से बाहर आती है और एक गुमनाम रूप से एक नया जीवन प्रारम्भ करती है | हवेली के लिए हीर हमेशा के लिए मर चुकी है पर वो अपनी कब्र के सामने मुंह ढकें खड़ी होकर अपनी सभी यातनाओं को याद करते हुए, अपने प्रेमी के संग अपने शेष जीवन को बिताने की हिम्मत कर चुकी है |

तहमीना दुर्रानी ने कुफ्र के जरिए दरगाह में पीर साई की वास्तविकता को उजागर करने का साहस किया है जो इस्लामी धर्म में वर्जित है | यह आत्मकथा निश्चित ही पाठकों को यातनाओं, अत्याचारों और एक हवेली के अंदर और बाहर एक व्यक्ति के दोहरे चरित्र को उजागर करने में सफल हुई है |

 

शनिवार, 15 नवंबर 2025

धरा से धूप - रजनी गुप्त

यादों के झरोखे से, धरा से धूप - रजनी गुप्त की इस पुस्तक में लेखिका ने आत्मकथा को उकेरा है। निर्मला से रजनी एवं चिरगांव से नई दिल्ली तक की यात्रा को अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में बताया गया है।
रजनी चिरगांव (झांसी) में पैदा हुई, जिसका एक बड़ा भाई और दो छोटी बहनें थी। पिता की मौत के बाद रजनी ने तत्कालीन समाज का विद्रोह करते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी। बचपन से ही कुछ बनने का सपना संजोएं किस्मत ने उन्हें  JNU, दिल्ली पहुंचा दिया जहां उन्हें जीवन का वास्तविक महत्व समझ आया।
JNU में की गई पी एच डी के सफर को उन्होंने विस्तार से बताया है। नौकरी की तलाश में उन्होंने कई परीक्षाएं और साक्षात्कार दिए। अंत में जे एन यू की महता पर उठे प्रश्नों का उत्तर देते हुए, उसे विद्यार्थियों की समझ और चिंतन को विकसित करने का उचित धरातल कहा है।
यह आत्मकथा लगभग हर उस लड़की के जीवन से प्रभावित है जो केवल स्नातक करके शादी नहीं करना चाहती है वरन स्वयं की भी एक पहचान बनाना चाहती है। परिवार, समाज और स्वयं की पहचान के मध्य के संघर्षों को *धरा पर धूप* में बताया गया है।

पुस्तक समीक्षा - कोरे कागज

  अमृता प्रीतम द्वारा लिखित “कोरे कागज” उपन्यास व्यक्ति के अंतर्गत की उथल-पुथल एवं स्वयं के होने की सच्चाई जानने की इच्छा पर आधारित है | उ...