सोमवार, 29 जून 2026

पुस्तक समीक्षा- 14, चित्रलेखा

 

भगवतीचरण वर्मा द्वारा रचित चित्रलेखा एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है जिसके सभी पात्र परिस्थितिजन्य अपने मन और मस्तिष्क के अनुसार निर्णय लेते है | यह उपन्यास महाप्रभु रत्नाम्बर के दो शिष्य श्वेतांक और विशालदेव के प्रश्न “पाप क्या है और पुण्य क्या है?’ से प्रारम्भ होता है और जिसका उत्तर पाने के लिए गुरु द्वारा दोनों शिष्यों को अलग-अलग स्वभाव के व्यक्तियों के पास भेजा जाता है |

वहाँ बीजगुप्त और कुमारगिरि क्रमश: वासना और अध्यात्म के प्रतीक है | श्वेतांक बीजगुप्त के साथ और विशालदेव कुमारगिरि के शिष्य के रूप में समय व्यतीत करते है और अपने प्रश्नों का उत्तर जानने का प्रयास करते है | किन्तु दोनों शिष्यों पाप-पुण्य, प्रेम-वासना में अंतर जानने हेतु जिझासु रहते है |

किन्तु प्रेम और वासना में अंतर कठिन लगता है तभी कहा है, “ प्रेम और वासना में भेद है, केवल इतना की वासना पागलपन है जो क्षणिक है, इसलिए वासना पागलपन के साथ ही दूर हो जाती है और प्रेम गंभीर है, उसका अस्तित्व शीघ्र नहीं मिटता |

उपन्यास का मुख्य चरित्र चित्रलेखा है जो प्रेम को साधना, तपस्या और समर्पण का रूप मानती है | जिसके वैधव्य जीवन में सर्वप्रथम कृष्णादित्य, फिर बीजगुप्त और फिर कुमारगिरि आते है | चित्रलेखा द्वारा परिस्थितिवश लिया गया फैसला, उसकी तत्कालीन मनोदशा का परिचायक है जिसमें वो अपने क्षणिक आकर्षण हेतु अपना ही अहित कर लेती है |

पूरा उपन्यास उचित-अनुचित, सही-गलत के मध्य एक प्रश्नचिह्न उत्पन्न करता है | जैसे एक सुंदर बगीचा यशोधरा को अनुपम आनंद और प्रकृति का विहंगम दृश्य नजर आता है वहीं बीजगुप्त को वही बगीचा कृत्रिम लगता है जिसके लिए दिए गए तर्कों से यशोधरा भी सहमत हो जाती है | उपन्यास बीजगुप्त के भौतिक संसार की वासना में लिप्त एवं कुमारगिरि का साधना में रत रहने से प्रारम्भ होता है और अंत में कुमारगिरि प्रेमवासना में ग्रस्त हो, चित्रलेखा को पाने के लिए असत्य वचन का भी प्रयोग करता है वहीं बीजगुप्त वैराग्य की ओर कदम बढ़ा लेता है |अब ऐसी स्थिति में पाप क्या है और पुण्य क्या है? इस प्रश्न का उत्तर प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है |

महाप्रभु रत्नाम्बर की सारगर्भित टिप्पणी इस प्रश्न का सार्थक उत्तर देने में सफल हुई है, " संसार में पाप कुछ भी नहीं हैं, यह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम हैं| हम न केवल पाप करते है और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है |"

पुस्तक समीक्षा- 13, महाभोज

 

महाभोज में मन्नू भंडारी ने राजनीति और नौकरशाही के दांव-पेचों को इस तरह से उकेरा है कि प्रत्येक आगे बढ़ता पृष्ठ एक जाल की भांति उलझता जाता है किन्तु इसी जाल के सृजक दा साहब जो शांत और मुस्कान लिए अपने इशारों पर काम करवाते जाते है और जनता, सत्तारूढ़ और विद्रोही पार्टी में अपने मसीहा की तलाश करती रह जाती है |

यदि कोई इस विद्रोह के विरुद्ध आवाज उठाने की कोशिश भी करता है तो बिसू, बिंदा, सक्सेना और लोचन के समान उसे कुचल दिया जाता है | दत्ता साहब और डी.आई.जी. केवल अपने लाभ के लिए आम जनता को गुमराह करने के लिए तैयार है | ऐसे में उपन्यास की यह पंक्ति इंसानियत की पैरवी अवश्य करती है कि “आदमी का दुख जिस दिन पैसे से दूर होने लगेगा, इंसानियत उठ जाएगी दुनिया से |”

मन्नू भंडारी यह उपन्यास निश्चित रूप से सोचने पर विवश करता है कि इस लोकतान्त्रिक देश में लोगों की क्या अहमियत रह गई है? जनता केवल कठपुतलियों की तरह काम करती है, जिसे जैसे चाहे वैसे नचाया जा सकता है | यही राजनीति है जहां खोटे सिक्के समाज चला रहे है और खरे सिक्के एक तरफ फेंक दिए गए है |

यह उपन्यास समाज की कुत्सित राजनीति का दर्पण है जिसमें सरोहा गाँव के दलित युवक बिसू की संदिग्ध हत्या पर राजनीति कर उसे चुनाव जीतने का माध्यम बनाया गया है | यहाँ मीडिया से लेकर पुलिस-प्रशासन सब लाचार या कठपुतली की तरह नजर आते है |

यह उपन्यास नेताओं के सतारुद्ध रहने के लिए किए गए साम-दाम-दंड-भेद का उपयोग कर किए नैतिक पतन और जनता के शारीरिक और मानसिक शोषण का परिचायक है | इस उपन्यास का नामकरण महाभोज एक व्यंग्य है जिसमें राजनैतिक फायदे के लिए की गई लोगों की हत्या किसी दुख की वजह नहीं वरन केवल महाभोज अर्थात सत्ता की खुशी का कारण होती है |

पुस्तक समीक्षा - कोरे कागज

  अमृता प्रीतम द्वारा लिखित “कोरे कागज” उपन्यास व्यक्ति के अंतर्गत की उथल-पुथल एवं स्वयं के होने की सच्चाई जानने की इच्छा पर आधारित है | उ...