वक्त बेवक्त ये हकीकत सामने आ ही जाती है
आदमी को पैदाकर, उसी से कुचल दी जाती है।
है ये आतंक क्रूरता का इतना भारी
होती अपने घर से पराई
और दूजे घर जला दी जाती है।
क्यूँ कहते है बेटी लक्ष्मी है?
उसी की खातिर बेघर कर दी जाती है।
आंसू की असंख्य कतारों को दबाए
क्यूँ पिता को देख, हर बार वो
मुस्कुरा दी जाती है।
हाँ आज भी तो है वही सतयुग
जहां सात फेरे लेकर भी छोड़ दी जाती है,
या जीतकर पांचों में बांट दी जाती है।