सोमवार, 27 जनवरी 2020

संबंधों का जाल


संबंधों के इस अंतरजाल में
फंस गया है ये संसार,
कैसे निकले बाहर प्रभु
कुछ तो सुझाओ उपाय।

हर तरफ है पैसों की मारामारी
ये तेरी कैसी लीला न्यारी,
लड़ रहा है भाई-भाई
रोती केवल माँ प्यारी।

टूट गया है अब अपनापन
रिश्ते कहे - पैसे खर्च,
कोई नहीं है अपना यहां
मन-मुटाव है इतना भारी।

दिखती नहीं अब कोई राह
हर तरफ मचा बस कोहराम,
प्रभु ! ये कैसा युग है
यहां कोई नहीं रह पाता खुश है।

पैसों की लगी बस दौड़ है,
रिश्ते तो ना जाने कहाँ गुम है,
तेरी रची इस दुनिया में
प्रभु ! तुम ही क्यूँ हो चुप।

कोई तो मार्ग निकालो प्रभु
सभी को राह दिखाओ तुम,
तेरी मेरी इस दुनिया को
अपना अहसास कराओ तुम।







मंगलवार, 21 जनवरी 2020

कुछ अरसे बाद

आज बहुत दिनों बाद कुछ कहने का मन हुआ
बीते हुए लम्हें फिर से जीने का मन हुआ।
देखकर तेरा मासूम सा चेहरा
फिर हंसने का मन हुआ,
मां के आंचल में फिर से
बहुत रोने का मन हुआ।
है तू मेरी हर सांस का सरगम
इसे फिर से गुनगुनाने का मन हुआ,
कर दिया तूने मुझे पूरा
ये तूझे बताने का मन हुआ।
आज बहुत दिनों बाद
बचपन फिर से जीने का मन हुआ।

कुछ तो रहमत थी उस खुदा की
जो तुझे मेरे पास भेजा,
जीवन की हर ख्वाईश को
तूझे देने का मन हुआ।
तेरे प्यारे से स्पर्श को
हर पल छूने का दिल हुआ,
तुझमें अपनी एक अलग
दुनिया बसाने का मन हुआ।

आज फिर एक अरसे बाद
कुछ कहने का मन हुआ।

पुस्तक समीक्षा - कोरे कागज

  अमृता प्रीतम द्वारा लिखित “कोरे कागज” उपन्यास व्यक्ति के अंतर्गत की उथल-पुथल एवं स्वयं के होने की सच्चाई जानने की इच्छा पर आधारित है | उ...