बुधवार, 22 सितंबर 2021

मुसाफिर- 23 सितंबर

वहम है कि वो अपना है,
नाते कभी खून से नहीं बनते,
इस अंधेरी दुनिया के सफर में,
इरादे ही तो बिना मन से नहीं पनपते।

कर तलाश खुद में खुद की,
साथ कभी कहकर नहीं बनते,
हाँ, हूँ मैं मुसाफिर यहां,
मंजिल की तलाश में अब हम नहीं भटकते।

जो छूट गया वो तेरा था ही नहीं,
अब हम इसे क्यों नहीं समझते,
है वही दुखी जो इसमें उलझा,
वरना सफर में किसी की तलाश ना करते।

कुछ जन्म से पाया, कुछ कर्म से कमाया,
खामोशियों की परवाह में क्यूँ,
तूने जो है उसे क्यूँ गंवाया।
है सभी पर उसी की छाया,
उसी ने हर रूप में, हर पल साथ निभाया,
हमने ही इस क्षणभंगुर 
संसार को, अपना रिश्तेदार बनाया।

ये सफर यूं ही कट जाएगा,
हर पल कुछ सीख दे जाएगा,
ना घमंड कर, सब कुछ पाने का ए मानव!
वापिस तो खाली हाथ ही जाएगा।

##गीता का सार##


पुस्तक समीक्षा - कोरे कागज

  अमृता प्रीतम द्वारा लिखित “कोरे कागज” उपन्यास व्यक्ति के अंतर्गत की उथल-पुथल एवं स्वयं के होने की सच्चाई जानने की इच्छा पर आधारित है | उ...