शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

उम्मीद


अंधेरे में जकडा आदमी  बोलता है

तकलीफों  से बंधा बार -बार सोचता  है।

होता होगा  कहीं सवेरा

कहीं वक्त मुस्कुराता  होगा

सांझ ढले पेडों पर कहीं

तो पक्षी चहकता  होगा ।

है बेरंग मेरी राहें क्यूं

क्यूं मैं इन सबसे अनजान हूं

साल महीने दिनों की इस दौड में

क्यूं मैं इतना परेशान हूं।

होगा  कहीं कोई तो मेरा

जो मेरी चाह रखता होगा

मेरी एक झलक पाने को

वो भी तो तरसता  होगा ।

बीते हुए किस पल की सजा?

जो मैं यहां काट रहा हूं

क्या था मैं सचमुच गुनहगार

बस यहीं न्याय मांग रहा हूं।

वक्त के इस मायाजाल  ने

मुझे बिल्कुल तोड दिया

जिंदगी के हर पल ने भी

मुझसे अब मुंह मोड लिया ।

बस इक उम्मीद  के सहारे  अब जिए जा रहा हूं

उजाले की चाह में अंधेरों को पिए जा रहा हूं।

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