महाभोज में मन्नू
भंडारी ने राजनीति और नौकरशाही के दांव-पेचों को इस तरह से उकेरा है कि प्रत्येक आगे
बढ़ता पृष्ठ एक जाल की भांति उलझता जाता है किन्तु इसी जाल के सृजक दा साहब जो शांत
और मुस्कान लिए अपने इशारों पर काम करवाते जाते है और जनता, सत्तारूढ़ और विद्रोही पार्टी में अपने मसीहा की तलाश करती रह जाती है |
यदि कोई इस विद्रोह
के विरुद्ध आवाज उठाने की कोशिश भी करता है तो बिसू, बिंदा, सक्सेना और लोचन के समान उसे कुचल दिया जाता है | दत्ता
साहब और डी.आई.जी. केवल अपने लाभ के लिए आम जनता को गुमराह करने के लिए तैयार है | ऐसे में उपन्यास की यह पंक्ति इंसानियत की पैरवी अवश्य करती है कि “आदमी का
दुख जिस दिन पैसे से दूर होने लगेगा, इंसानियत उठ जाएगी दुनिया
से |”
मन्नू भंडारी यह उपन्यास
निश्चित रूप से सोचने पर विवश करता है कि इस लोकतान्त्रिक देश में लोगों की क्या अहमियत
रह गई है? जनता केवल कठपुतलियों की तरह काम करती है, जिसे जैसे
चाहे वैसे नचाया जा सकता है | यही राजनीति है जहां खोटे सिक्के
समाज चला रहे है और खरे सिक्के एक तरफ फेंक दिए गए है |
यह उपन्यास समाज की
कुत्सित राजनीति का दर्पण है जिसमें सरोहा गाँव के दलित युवक बिसू की संदिग्ध हत्या
पर राजनीति कर उसे चुनाव जीतने का माध्यम बनाया गया है | यहाँ मीडिया से लेकर पुलिस-प्रशासन सब लाचार या कठपुतली की तरह नजर आते है
|
यह उपन्यास नेताओं
के सतारुद्ध रहने के लिए किए गए साम-दाम-दंड-भेद का उपयोग कर किए नैतिक पतन और जनता
के शारीरिक और मानसिक शोषण का परिचायक है | इस उपन्यास
का नामकरण महाभोज एक व्यंग्य है जिसमें राजनैतिक फायदे के लिए की गई लोगों की हत्या
किसी दुख की वजह नहीं वरन केवल महाभोज अर्थात सत्ता की खुशी का कारण होती है |
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