नदी के द्वीप “अज्ञेय” द्वारा रचित एक मनोवैज्ञानिक एवं बौद्धिक उपन्यास है | उपन्यास के नाम में नदी सांकेतिक रूप से समाज एवं द्वीप व्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है | द्वीप और नदी एक-दूसरे से जुड़े हुए है | नदी चाहे किसी भी द्वीप को अपने अंदर समाहित कर लें पर द्वीप नदी को समाहित नहीं कर सकता है उसी प्रकार व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है, उसे इसी समाज की धारा में निरंतर बहते हुए चले जाना है |
इस उपन्यास में मुख्य रूप से चार केंद्रीय पात्र है - रेखा, भुवन, गौरा और चंद्रमाधव | हेमेन्द्र और डॉ रमेशचन्द्र के पात्र की भूमिका कम अवश्य है किन्तु कहानी के प्रवाह में आवश्यक प्रतीत होता है | रेखा एक आत्मनिर्भर, साहसी एवं पढ़ी-लिखी महिला है जो हेमेन्द्र से अलग होने पर अपना जीवन अपने अनुसार व्यतीत कर रही है| चंद्रमाधव के यहाँ रेखा की मुलाक़ात, उसके दोस्त भुवन से होती है जो एक वैज्ञानिक है और कास्मिक रश्मियों के अन्वेषण में व्यस्त रहता है | चंद्रमाधव जो कि एक पत्रकार है एवं उसके कहने पर भुवन लखनऊ आता है | इसी मुलाक़ात में भुवन और रेखा एक-दूसरे के विचारों से प्रभावित होते है | यद्यपि चंद्रमाधव रेखा के पति हेमेन्द्र का मित्र है और वैवाहित है किन्तु वह रेखा की ओर आकर्षित होता है जिसमें रेखा की अस्वीकृति होती है |
इस प्रकार कहानी का प्रवाह, एक और पात्र गौरा का परिचय करवाता है जिसे भुवन बचपन में पढाता था और उसे जीवन का एक लक्ष्य देता है | गौरा एक सहृदय, संस्कारी, अंतर्मुखी और शिक्षित महिला है | कहानी इन तीन पात्रों के इर्द-गिर्द चलती है जहाँ मित्रता-प्रेम-समर्पण-त्याग सब एक साथ चलते है और इनमें भिन्नता करना मुश्किल हो जाता है | किन्तु सभी पात्र एक-दूसरे से पत्र के माध्यम से जुड़े हुए है |
रेखा, भुवन का नजदीक आना, रेखा के विवाह प्रस्ताव पर भुवन की चुप्पी, रेखा का गर्भपात करवाना, भुवन का खुद को दोषी मानना, गौरा का मौन प्रेम, भुवन की कशमशकता, रेखा का पुर्नविवाह, भुवन का अपने आंतरिक विचारों को पहचानना और गौरा के प्रति प्रेम को जानना आदि मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से पूर्ण है | जो व्यक्ति के मन की उलझनों को भावों में पिरोकर एक परिपक्व समझ प्रस्तुत करता है | व्यक्ति सामाजिक जीवन जीते हुए भी पूर्णतया स्वतंत्रता चाहता है, किसी अनायास परिणाम को जानकर भी स्वयं को बांधना नहीं चाहता है | यही स्थिति उनके शब्दों में भी परिलक्षित होती है | जब रेखा भुवन को कहती है, "दूसरों की बनायी हुई लीकों की बात मैं नहीं सोच रही हूँ | व्यक्तित्व की अपनी लीकें होती हैं- एक रुझान होता है |"
जब भुवन के साथ एक विशेष क्षण साझा करने के बाद रेखा की उक्ति "आई एम फुलफील्ड | अब अगर मैं मर जाऊँ तो परमात्मा के प्रति-प्रकृति के प्रति - यह आक्रोश लेकर नहीं जाऊँगी कि मैंने कोई भी फुलफिलमेंट नहीं जाना - कृतज्ञ भाव ही लेकर जाऊँगी, परमात्मा के प्रति और भुवन तुम्हारे प्रति |"
रेखा के द्वारा विवाह प्रस्ताव पर भुवन का कोई जवाब ना मिलने पर रेखा का आत्मिक निर्णय- "मैंने तुमसे प्यार मांगा था, तुम्हारा भविष्य नहीं मांगा था|"
गौरा की वह निष्काम अभिव्यक्ति जिसमें अपने प्रेम-स्नेह रूपी भुवन को शिशु कहकर संबोधित किया- "सचमुच मेरे जीवन का सबसे बड़ा इष्ट यही है कि तुम्हें सुखी देख सकूँ- तुम्हारा वरण ठीक कर सकूँ | मेरे स्नेह शिशु, मैं तुम्हारे ही लिए जीती हूँ क्योंकि तुममें जीती हूँ |"
सचमुच अज्ञेय ने मनुष्य के भीतर व्याप्त विचारों और संवेदनाओं को इन पात्रों के माध्यम से प्रकट किया है जहाँ रेखा और गौरा दोनों भुवन के प्रति आकर्षित है, दोनों अत्यंत संवेदनशील है और त्याग एवं समर्पण हेतु तत्पर है | वहीं भुवन परिस्थितियों के अनुसार कार्य करता है किन्तु निर्णय लेने का साहस नहीं कर पाता है जिस कारण स्वयं को समर्पित करती हुई रेखा गर्भपात का फैसला लेकर भुवन को हर बंधन से स्वतंत्र कर देती है |
मिलन-विरह, प्रेम-त्याग, विचार-जज़्बात आदि संवेदनाओं से परिपूर्ण यह उपन्यास सहृदय पाठकों के अंत:करण को अवश्य ही प्रभावित करता है | पत्रों के सिलसिले के माध्यम से पात्रों के मध्य भावनाओं और विचारों का आदान-प्रदान गहन सोच और समझ का प्रतीक है |
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