सोमवार, 27 जनवरी 2020

संबंधों का जाल


संबंधों के इस अंतरजाल में
फंस गया है ये संसार,
कैसे निकले बाहर प्रभु
कुछ तो सुझाओ उपाय।

हर तरफ है पैसों की मारामारी
ये तेरी कैसी लीला न्यारी,
लड़ रहा है भाई-भाई
रोती केवल माँ प्यारी।

टूट गया है अब अपनापन
रिश्ते कहे - पैसे खर्च,
कोई नहीं है अपना यहां
मन-मुटाव है इतना भारी।

दिखती नहीं अब कोई राह
हर तरफ मचा बस कोहराम,
प्रभु ! ये कैसा युग है
यहां कोई नहीं रह पाता खुश है।

पैसों की लगी बस दौड़ है,
रिश्ते तो ना जाने कहाँ गुम है,
तेरी रची इस दुनिया में
प्रभु ! तुम ही क्यूँ हो चुप।

कोई तो मार्ग निकालो प्रभु
सभी को राह दिखाओ तुम,
तेरी मेरी इस दुनिया को
अपना अहसास कराओ तुम।







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