मंगलवार, 2 जून 2020

पलायन - एक विवशता

है ये मासूम कितना मजबूर
खेलने की उम्र में
चला कितनी दूर ।
थी लंबी दूरी
पैदल ही की पूरी,
तेज धूप ने थकाया था
पर इस मासूम ने तो
पत्थर को ही
अपना बिस्तर बनाया था।
हाथ पकड़ माँ का
चला वो
अपने गांव।
जहां है अपने उसके
मुश्किल में देंगे साथ,
हर डर को हरा कर
नंगे ही चल पड़े थे
उसके पांव।
चेहरे पर है उम्मीद
ले जा रही है
माँ कहीं दूर
ना ट्रेन ना बस
ना मिला शहर की सेवा
का कोई प्रतिफल।
रोटी है हाथ
परिवार है साथ,
चल पड़ा फिर एक बचपन
अपने पिता के जन्मस्थान |

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