मंगलवार, 19 मई 2020

यूं ही....

ज़िंदगी के उस पहले पहलू का भी
एक अजीब किस्सा हुआ,
सारे दर्द के मर्म का सार
ना जाने कैसे उसी से मिला
मैं इस पहलू को सुलझाता रहा और
ये मुझे अनगिनत गम के किस्से दे गया।

आज मुद्दतों के बाद
तेरे चेहरे पर सुकूं दिखा है,
मेरे जाने की राहत है या
लौट आने का यकीं।

कुछ पलों में ही जी ली मैंने
अपनी जिंदगी,
अब मिली हर खुशी
बोनस ही नजर आती है।

यूं छुपके से तेरा आना
तेरी आहट बता ना पाया,
बंद आंखों से भी मैंने
तुझे देख तो लिया था ही।

तेरी हर आरजू 
मेरा जुनून है,
बस मैं ही नहीं हो पाई तेरी
मेरी रूह तेरी है।

यू वीरान पडी थी लताएं
तूने उसे जां दे दी,
आज भी वो सारा जंगल
तुझे ही तलाश रहा है।

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