कहानी --- सपनों की उड़ान...
“समय
हर मर्ज की दवा है” – संतोषी बचपन से यही सुनती आई थी |
संतोषी
आठ साल की एक प्यारी सी लड़की थी | नाम के
अनुरूप स्वभाव से संतोष स्वभाव वाली और कद-काठी, रूप-रंग से
एकदम राजकुमारी | अपनी निश्छ्ल मुस्कान से वो सभी को अपनी ओर
आकर्षित कर लेती थी |
संतोषी
का जन्म राजस्थान के छोटे से गाँव में हुआ था, यह गाँव अभी भी आधुनिकता से कोसों दूर था | यहाँ
अभी भी बेटी के पैदा होने पर खुशियाँ नहीं बनती थी | यहाँ के
लोगों का जीवनयापन खेती, पशु-पालन और मजदूरी जैसे कार्यों से
ही होता था | पढ़ाई के नाम पर 12वी तक का एक सरकारी स्कूल था
जहाँ लड़कियाँ केवल नाम-मात्र के लिए ही दाखिला लेती थी |
संतोषी
के परिवार में दादी, माँ-पिता और
काका-काकी थे | जब संतोषी पैदा हुई थी तब दादी ने एक सप्ताह
तक खाना नहीं खाया था | शायद पोता पाने की आस में दादी की
संतोषी पर नजर ही नहीं गई थी | पर माँ-बाप बेटी को पाकर बहुत
खुश थे | यद्यपि उनका परिवार निम्नवर्गीय संयुक्त परिवार था
जहाँ परिवार के दो आदमी मजदूरी करके अपने पूरे परिवार का भरण-पोषण करते थे | जब संतोषी चार साल की हुई तब उसकी काकी ने एक लड़के को जन्म दिया जिसका
आगमन दादी के चेहरे पर खुशियाँ लेकर आया | ये परिवर्तन
संतोषी महसूस कर रही थी पर अपने माँ-पिता के साये में वो चहकती रहती थी इसीलिए
दादी की नफरत का भी वो बुरा नहीं मानती थी |
जब
संतोषी चार साल की हुई तब उसके पिता भूषण ने उसका दाखिला पास के सरकारी स्कूल में
करवा दिया, अपने अनपढ़ परिवार में
संतोषी को पढ़ाने के लिए भी भूषण को अपनों से ही लड़ना पड़ा | भूषण
संतोषी को पढ़ाकर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहता था किन्तु समय की डोर ने किस्मत में
क्या लिखा है ये कोई नहीं जानता | समय अपनी रफ्तार से चल रहा
था, संतोषी के स्कूल के सभी अध्यापक उसे बहुत पसंद करते थे
क्योंकि संतोषी पढ़ाई में बहुत अच्छी थी | संतोषी चौथी कक्षा
में हो गई थी | संतोषी की माँ रमादेवी ने घर पर सिलाई का काम
शुरू कर दिया था जिससे घर के हालत कुछ ठीक होने प्रारम्भ हुए थे | संतोषी की काकी भी रमादेवी के सिलाई के काम में हाथ बंटाने लगी और उसका
बेटा गोपाल संतोषी के साथ स्कूल जाने लग गया था | भूषण के
परिवार में स्त्री और पुरुष, सभी के संयुक्त प्रयास से अब
दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु धन की कमी नहीं थी |
परंतु
दादी का प्यार अभी तक केवल गोपाल के लिए था | दादी का कहना था कि लड़कियों को तो पराये घर जाना है, उन्हें पढ़ाने की जरूरत क्या है? उन्हें घर के काम ही
सिखाए जाए | परंतु भूषण अपनी बेटी को गाँव की छोटी सोच के
दायरे में नहीं लाना चाहता और उसे पढ़ा-लिखाकर स्वाभिमान से जीना सिखाना चाहता था | भूषण स्वयं पढ़ा-लिखा नहीं था परंतु उसे शिक्षा की अहमियत का पता था | संतोषी की मासूमियत, खूबसूरती और पढ़ाई में तेज
दिमाग देखकर उसकी काकी अंदर ही अंदर उससे जलती थी वो चाहती थी कि उसके बेटे को ही
सभी प्यार करें, संतोषी को नहीं | पर
भूषण के आगे वो कुछ बोल नहीं पाती थी | कुछ नफरत, कुछ प्यार और कुछ तकरार के साथ भूषण का परिवार अपना गुजर-बसर कर रहा था |
संतोषी
का बचपन भविष्य की सुनहरी रोशनी की ओर प्रतिदिन एक ओर कदम बढ़ा रहा था | संतोषी आठ साल की हो चुकी थी | माँ की सिलाई से जुड़े छोटे-छोटे कामों में भी हाथ बंटाने लग गई थी | इसी बीच बारिश का मौसम शुरू हो गया था परंतु इस बार की बरसात हर साल की
बारिश से अलग थी, एक सप्ताह तक दिन-रात लगातार बरसने के बाद
बरसात रुकी | कई घरों और खेतों में पानी भर गया था औरे
संतोषी के घर की भी पीछे की दीवार टूट गई थी, जिसे भूषण और
उसके भाई ने मिलकर ठीक कर दिया | 4 दिनों बाद सब-कुछ सामान्य
हुआ ही थी कि गाँव में बीमारी फैलने लगी, जिसमें संतोषी का
घर भी अछूता नहीं रहा | संतोषी के माँ-बाप इस बीमारी में
अपनी जान गंवा बैठे | दादी की हालत भी बहुत गंभीर थी |
गाँव
में इस भयंकर बीमारी से बहुत लोगों की जान चली गई | आठ साल की संतोषी अनाथ हो गई थी | उसके बचपन की
मासूमियत कहीं खो गई थी | माँ-पिता के जाने के बाद अचानक ही
काका-काकी का व्यवहार उसके प्रति बुरा हो गया था, दादी पहले
से ही बिस्तर पर थी | घर के सारे काम काकी ने उस अबोध संतोषी
से करवाने शुरू कर दिए थे | पर संतोषी अपने नाम के अनुरूप ही
था, इन सभी के बावजूद वो अपने पिता का सपना पूरा करना चाहती
थी इसलिए प्रतिदिन स्कूल जाना उसने जारी रखा |
घर
के प्रतिकूल व्यवहार पर भी संतोषी ने दसवीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की | परंतु उसके काका-काकी उसकी शादी करवाकर
अपने कर्त्तव्य से मुक्त होना चाहते थे | यहीं से संतोषी का
संघर्ष प्रारम्भ हो गया था | माता-पिता के साये में लाड़ से
पलने वाली संतोषी की दशा आज दयनीय हो गई थी | काका तो पूरे
दिन घर से बाहर ही रहता था, पीछे से काकी उससे सफाई, बर्तन, कपड़े धोना, दादी की
देख रेख आदि सारे काम करवाती थी और काम करने पर भी अपनी नफरत के चलते उसकी पिटाई
भी कर देती थी | संतोषी की शादी के लिए लड़के की खोज शुरू हो
गई परंतु बिना दहेज के कोई शादी के लिए तैयार नहीं था | यही
कुप्रथा भी संतोषी के लिए सकारात्मक सिद्ध हुई और उसे आगे की पढ़ाई करने का समय भी
मिल गया था|
संतोषी
की उम्र अब 16 साल की हो गई थी | काकी के
अत्याचारों के बीच संतोषी ने रात को पढ़ना शुरू कर दिया |
पूरा दिन घर का काम और रात में पढ़ाई के कारण संतोषी की हालत बीमारों जैसी हो गई थी
| राजकुमारी जैसी दिखने वाली संतोषी का चेहरा मुरझा सा गया
था | पर उसने पढ़ाई को खुद से अलग नहीं होने दिया, जब भी कभी वो हालातों के आगे खुद को हारा महसूस करने लगती, उसे अपने पिताजी की बात याद आ जाती कि मेरे बेटी अपने पैरों पर खुद खड़ी
होगी | यह सोचकर संतोषी में एक नया उत्साह भर जाता था और वो फिर
पढ़ने में लग जाती थी | संतोषी स्कूल नहीं जा पा रही थी इसी
बीच उसके अध्यापक रामलाल ने उसकी 12वीं कक्षा की पुस्तकें घर पर ही उपलब्ध करा दी
थी | रामलाल जी गाँव के प्रतिष्ठित व्यक्ति होने के साथ-साथ
ज्ञानवान अध्यापक भी थे | उनकी पत्नी बहुत वर्षों पूर्व ही
गुजर गई थी तभी से वो अकेले ही अपने बेटे का पालन कर रहे थे | गाँववालों ने उन्हें दूसरी शादी करने हेतु बहुत ज़ोर डाला परंतु उन्होने
मना कर दिया | उन्होने अपने बेटे शिव को गाँव के सरकारी
स्कूल से ही 12 वीं पास करवाकर आगे की पढ़ाई के लिए शहर भेज दिया था |
इन
सभी परिस्थितियों के मध्य संतोषी खुद को फंसा हुआ महसूस करनी लगी थी, हर समय मुस्कुराने वाली लड़की अब उदास सी
रहने लगी थी | काकी की गालियों की अब उसे आदत सी हो गई थी | इन सभी के बीच वो दादी की सेवा करना कभी नहीं भूलती थी | दादी पूरी तरह से बिस्तर पर थी पर संतोषी के उसके प्रति सेवाभाव और घर
में उसके साथ हो रहे बुरे बर्ताव को वो देख पा रही थी परंतु अपनी लाचारता के कारण
कुछ नहीं कर पा रही थी पर मन ही मन वो संतोषी के अच्छे जीवन के लिए भगवान से दुआ
मांग रही थी | आज दादी को महसूस हो रहा था कि उसकी बीमारी के
हालत में उसका बेटा और पोते ने एक बार भी उसके पास नहीं आए और जिससे वो सबसे
ज्यादा नफरत करती थी उसी संतोषी ने उसका सबसे ज्यादा ध्यान रखा |
कहते
है दुख के बादलों के बाद एक नया सवेरा हमेशा आता है जो अगणित खुशियाँ लेकर आता है | शायद संतोषी के जीवन पर भी यह कहावत
चरितार्थ हो पाए | आज सुबह से ही संतोषी अपने माता-पिता को
बहुत याद कर रही थी और अपनी दादी के बिस्तर के पास बैठी उन्हें रामायण सुना रही थी
| तभी दादी का हाथ उसके हाथ को छूआ | यह
पहली बार था कि बीमारी के बाद दादी के किसी अंग में कोई हरकत हुई थी | शायद दादी की तबीयत ठीक हो रही थी, उन्होने संतोषी
के सिर पर हाथ फेरा, मानों ढेर सारी खुशियाँ मिलने का
आशीर्वाद दे रही हो |
तभी
दरवाजे पर किसी की दस्तक हुई | दरवाजा
काकी ने खोला – सामने अध्यापक जी को देखकर चौंक गई | रामलाल
जी हाथ में लड्डू लिए अंदर आए और काकी को बधाई देने लगे |
रामलाल जी संतोषी..... संतोषी.... पुकार रहे थे | संतोषी
बाहर आई तो रामलाल जी ने बताया कि संतोषी ने 12वीं बोर्ड में पूरे जिले में प्रथम
स्थान प्राप्त किया है | आज बरसों बाद संतोषी के चेहरे पर
खुशी साफ झलक रही थी | इतनी देर में गाँववाले भी सभी संतोषी
के घर आ गए | गाँव में पहली बार किसी ने बोर्ड में स्थान
प्राप्त किया था वो भी प्रथम.... | संतोषी को बधाई देने
वालों की कतार लग गई थी |
रामलाल
जी की मदद से संतोषी को शहर के सरकारी कॉलेज में दाखिला मिल गया और सरकार से
छात्रवृत्ति भी मिल गई | सच कहा गया
है कि मेहनत का फल अवश्य मिलता है | रामलाल जी ने पढ़ाई पूरी
होने पर अपने बेटे शिव से संतोषी का विवाह करा दिया | शिव डॉक्टर
बन गया था और उसने गाँव में ही उसने अपना अस्पताल खोल लिया था | रामलाल जी के निष्काम प्रयास और संतोषी के मेहनत के परिणामस्वरूप संतोषी
उसी स्कूल में अध्यापिका बन गई थी | रामलाल जी के अनुरूप ही
उनके बेटे और बहू ने भी गांववालों की सेवा के लिए हमेशा तैयार रहते थे | शिव के प्रयासों से अब संतोषी की दादी भी काफी ठीक हो गई थी |
संतोषी का जीवन कष्टमय और संघर्षमय अवश्य था परंतु उसके
सपनों की उड़ान ने उसे रुकने और गिरने नहीं दिया |
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