एक परिवार में एक कन्या पहली
संतान के रूप में पैदा हुई। उसका नाम सुंदरा रखा गया। सुंदरा अपने नाम की तरह ही
बहुत सुंदर थी। सुंदरा की परवरिश बहुत ही अच्छे से की गई और उसे पूरी तरह
आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा दी गई।
सुंदरा को पढ़ा-लिखाकर नौकरी
लगाकर उसकी शादी कर दी गई। शादी के बाद उसे जिंदगी की असली हकीकत समझ आई। तब उसे पता चला कि क्यूँ लड़की की किस्मत को
"आँचल में दूध और आंखों में पानी" कहा जाता है।
आजकल की दुनिया में जब लड़की
अपने पैरों पर खुद खड़ी है तो दहेज के रूप भी बदल गए है।
सुंदरा के ससुराल वालो को उसकी शादी में मिला सामान रास नहीं आया। इस कारण उन्होंने सुंदरा के खिलाफ अपने बेटे के कान भरने शुरू कर दिए। सुंदरा बहुत अकेली हो गई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे।
सुंदरा अंदर तक टूट चुकी थी।
उसकी कमाई पर भी हर पल उनकी नजर थी। सुंदरा को हर पल तलाक के नाम से डराया जाने
लगा। तब उसे समझ आया कि क्यूँ एक मां भी अपने पेट में लड़की जानकर उसे गिराने के
लिए तैयार हो जाती है, अपनी बेटी
का भविष्य कही ना कही उसका जाना-पहचाना या सुना हुआ होता है।
पैसों का लालच इतना हावी हो
जाता है कि वो भूल जाते है कि पैसा रिश्तों से बड़ा नहीं होता है। इसी के बीच
सुंदरा एक बेटे को जन्म देती है और खुद से एक प्रण करती है कि वो अब ओर अन्याय
नहीं सहेगी।
आखिर में सुंदरा के ससुराल
वालों ने मिलकर एक बाप को बच्चे से अलग करवा ही दिया।
सुंदरा ने इसे अपनी नियति
माना और अपने बेटे के लिए जीना शुरू कर दिया। आज सुंदरा अपने बेटे के साथ बहुत खुश
है। पर एक प्रश्न हमेशा सुंदरा को परेशान करता है कि क्या पढ़ा लिखाकर लड़के के
बराबर बनाकर भी एक लड़की वही की वही खड़ी है?
आज हर परिवार में कोई ना कोई सुंदरा मिल ही जाएगी। मुझे भी आज मिली। "बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ" से कुछ नहीं होगा, जब तक सुंदरा जैसी लड़की इसे अपनी नियति मानकर चुप रहेगी।
ऐसे पैसों के लालचियों के खिलाफ सभी को मिलकर लड़ना होगा पर हकीकत यह है कि उसके अपने भी बेटी की विदाई के बाद उसकी नियति मानकर उससे मुंह मोड लेते है |
एक औरत से जन्म लेकर जब एक आदमी दूसरी औरत को दुख, मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना देता है तो उसे समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं है।
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