रविवार, 3 अप्रैल 2022

पिंजर

पूरो....

एक मार्मिक कहानी का अत्यंत संवेदनशील पात्र।
जो परियों के राजकुमार को पाने की अवस्था में पीढ़ियों की दुश्मनी का शिकार हो गई।

धर्म एवम् बदले के नाम पर किए गए अत्याचार में मानव की भावुकता और संवेदनाएं अक्सर कुचल दी जाती है पर रशीद की कथनी और करनी में अंतर नहीं था और उसने पूरो के दिल को कहानी के अंत तक जीत ही लिया था ।

स्त्री पर किया गया अनैतिक कृत्य यकीनन उनके पावन अस्तित्व पर किए गए कुठाराघात का स्मरण करवाता है और कतिपय पुरुष की विक्षिप्त सोच पर प्रश्नचिह्न लगाने पर मजबूर कर देता है।

अमृता प्रीतम जी की कहानी का अंतिम पैरा भारत और लाहौर के मध्य पारो जैसे कई पात्रों के जीवन को चित्रित करता है जिनके लिए परिवार धर्म एवम् समाज से ज्यादा श्रेष्ठ है। यकीनन यह अत्यंत वास्तविक एवम् मार्मिक कहानी है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

पुस्तक समीक्षा - कोरे कागज

  अमृता प्रीतम द्वारा लिखित “कोरे कागज” उपन्यास व्यक्ति के अंतर्गत की उथल-पुथल एवं स्वयं के होने की सच्चाई जानने की इच्छा पर आधारित है | उ...