मेरी यादों का बक्से बचपन की छुट्टियों की बहुत सी यादें समेटे हुए है। उसमें जिसका सबसे ज्यादा इंतजार होता था वो होती थी गर्मियों की छुट्टियां।
मेरे परिवार में दादा दादी, मां पापा और हम तीन भाई बहन थे। सुबह उठना तैयार होना, स्कूल जाना और आकर खाना खाकर स्कूल का सारा होमवर्क करना ताकि पूरी शाम गलियों या पार्क में खेला जाए और रात को पकड़कर लाने पर ही घर आया जाए। तब ना कोई गर्मी लगती थी और ना ही भूख प्यास। हमारे खेल अक्सर पिट्ठू, तेरा रंग कौनसा, एक लड़की धूप में बैठी रो रही थी..., पकड़पड़ाई, बर्फ पानी हुआ करते थे। फिर शाम को खाना खाकर दादी से कहानियां सुनना, सचमुच वो जीवन के अनमोल पल थे जहां शाम का इंतजार सुबह उठते ही शुरू हो जाता था।
इन सभी के बीच इंतजार होता था, गर्मियों की छुट्टियों का जिसमें बुआ और उनके बच्चों के आने के बाद की जुगलबंदी कुछ और ही होती थी । जिस दिन स्कूल की छुट्टियां होती, उसी रात को देर तक बैठकर या अगले दिन बुआ के आने से पहले सारा छुट्टियों का होमवर्क पूरा करके स्कूल बैग को अलमारी के ऊपर रख दिया जाता था ताकि चैन से छुट्टियों का मजा लिया जा सकें।
चूंकि बुआ के बेटे बड़े थे तो हम सभी को सुबह उठाकर पार्क ले जाते थे जहां हम खूब खेलते थे और वहां नीम की दातून से दांत साफ करते हुए हम आते थे। नीम से दातून करना हमें भैया ने ही सीखाया था। भैया शायद तब चौदह साल के रहे होंगे पर सुबह हमें दौड़ाते हुए पार्क ले जाते थे। घर आकर हमारी कोशिश रहती थी कि हम फिर सो जाए पर कभी सो नहीं पाए।
दोपहर हमें अभी बुरी लगती थी क्योंकि घर का प्रत्येक सदस्य दोपहर में सोकर आराम करना चाहता था और हम बच्चों को नींद कहां आती थी। फिर शुरू होते थे इंडोर खेलों की लंबी श्रृंखला जो शाम होने तक चलती रहती थी। उसमें भी कई बार दोपहर में भी बाहर खेलने भाग जाते थे क्योंकि दोपहर में घर में शोर करना मना था। एक बार हम ऐसे ही दोपहर में बाहर पार्क में फुटबाल खेलने चले गए। हम कुल सात भाई बहन खेल रहे थे , मैं जैसे ही फुटबाल को पकड़ने लगी मेरी हथेली किसी मजबूत चीज पर लगी और हाथ में दर्द शुरू हो गया। घर पर डांट ना पड़े, इसलिए घर पर कुछ नहीं बताया । पर हाथ का दर्द बढ़ता जा रहा था। मां ने हाथ पर मूव भी लगाई पर कोई आराम नहीं मिला। सुबह तक मेरा हाथ फूलकर दुगुना हो गया था । जब मुझे डॉक्टर के ले जाया गया तब पता लगा कि उसमें फैक्चर हो गया है और अब एक महीने तक उस पर पट्टा बांधा गया।
वो गर्मियों की छुट्टियां मुझे हमेशा याद रहेगी क्योंकि उन छुट्टियों में मैं केवल इनडोर खेल ही खेलती थी और मेरे सारे भाई शाम को पार्क जाते हुए मुझे तंग करते हुए जाते थे और मैं उनके घर वापिस आने का इंतजार करती रहती दी। पर सचमुच वो दिन बहुत ही यादगार हुआ करते थे।
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