सोमवार, 27 मई 2024

मैदान मूवी

खेल से जुड़ी एक ओर कहानी मैदान के रूप में हमारे समक्ष है। 

नेतृत्वकर्ता की भूमिका हमेशा जीत और हार में बराबर की होती है फिर चाहे बात देश की हो या खेल की।
सैयद अब्दुल रहीम का नाम फुटबाल कोच में स्वर्णिम है जिन्होंने अपने जीवन का ध्येय टीम को जीतते देखना रखा।

देश के आपसी मतभेदों के कारण देश काफी बार पीछे रह जाता है पर जब रहीम जैसी दृढ़ निश्चयता और खुद पर विश्वास हो तो यकीनन कुछ भी मुश्किल नहीं है। सबसे पहले उन्होंने फुटबॉल टीम के लिए राज्य, धर्म, जाति से हटकर प्रतिभावान खिलाड़ियों को चुना। खिलाड़ियों को तराशना और उन्हें योग्य बनाने में परिवार का सहयोग ही आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

टीम का 1962 का एशियन कप जीतना इस बात का गवाह है कि हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है बस रहीम जैसे जाैहरी विरले ही होते है।

यकीनन अंत तक बांधकर रखने वाली मूवी है। कोच पहले कोच होता है बाद में पिता - इस एक पंक्ति में एक सारगर्भित एवं देश सर्वोपरि का संदेश छिपा है। हालांकि पूर्णत: बंगाली संस्कृति निहित थी जो आवश्यक भी थी। एक प्रेरणादायक मूवी रही मैदान।

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