रजनी चिरगांव (झांसी) में पैदा हुई, जिसका एक बड़ा भाई और दो छोटी बहनें थी। पिता की मौत के बाद रजनी ने तत्कालीन समाज का विद्रोह करते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी। बचपन से ही कुछ बनने का सपना संजोएं किस्मत ने उन्हें JNU, दिल्ली पहुंचा दिया जहां उन्हें जीवन का वास्तविक महत्व समझ आया।
JNU में की गई पी एच डी के सफर को उन्होंने विस्तार से बताया है। नौकरी की तलाश में उन्होंने कई परीक्षाएं और साक्षात्कार दिए। अंत में जे एन यू की महता पर उठे प्रश्नों का उत्तर देते हुए, उसे विद्यार्थियों की समझ और चिंतन को विकसित करने का उचित धरातल कहा है।
यह आत्मकथा लगभग हर उस लड़की के जीवन से प्रभावित है जो केवल स्नातक करके शादी नहीं करना चाहती है वरन स्वयं की भी एक पहचान बनाना चाहती है। परिवार, समाज और स्वयं की पहचान के मध्य के संघर्षों को *धरा पर धूप* में बताया गया है।
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