“लेखन अपने स्वर की
खोज है – शुरुआत कविता से ही थी, अंत भी कविता से होगा
|”
विनोद कुमार शुक्ल
साहित्य अकादमी पुरस्कार
से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल की कृति “दीवार में एक खिड़की रहती थी” एक मध्यमवर्गीय
जीवन को दर्शाती है | एक महाविद्यालय में अध्यापक
रघुवर और उसकी पत्नी सोनसी की कहानी है जो अपने दो कमरे के घर में सुखमय रूप से जीवन
यापन कर रहे है | माँ-पिता एवं छोटू(भाई) बीच-बीच में गाँव से
उनके पास आते रहते है | इस शांत जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण है, घर के अंदर एक खिड़की जो मुख्य दरवाजे से विपरीत दिशा में है जिससे कूदकर रघुवीर
और सोनसी एक सुंदर प्रकृति में खो जाते है जहां हवा में फूलों की सुगंध है, पेड़ों में लटकते आम है, तालाब में खिलते कमल है, उछलते-कूदते बंदर है, एकांत के क्षण है और बूढ़ी अम्मा
की टपरी की चाय है | बूढ़ी अम्मा का सोनसी पर इतना स्नेह था कि
उन्होन्ने अपने सोने के कंगन सोनसी को दे दिए |
वही रघुवीर टैंपो
से महाविद्यालय आते-जाते थे जिसके समय पर ना मिलने पर अक्सर देर हो जाती थी | रघुवीर को प्रतिदिन एक हाथीवाला दिखता था, वो अक्सर
महाविद्यालय जाता था जो बाद में उसकी दिनचर्या का मुख्य भाग बन गया | कभी-कभी साधु हाथी को थोड़ी देर के लिए रघुवीर के घर भी छोड़ जाता था |
शुक्ल की इस कहानी
के सभी पात्र मानवीय गुणों से भरपूर एवं ईमानदार है फिर चाहे साधू, विभागाध्यक्ष, रघुवीर, सोनसी, बूढ़ी माँ, छोटू, माँ-पिता या फिर
पेड़ पर छिपकर बीड़ी पीने वाला बच्चा|
वह बच्चा अपने पिता
के डर से घर नहीं जाता था और पेड़ पर छिपकर बीड़ी पीता था | सोनसी ने कई बार उसे खाना खिलाया | रघुवीर ने उसे उसके
पिता से मिलाया और दोनों के मध्य के मुटाव को दूर किया |
विभागाध्यक्ष भी महाविद्यालय
में एक साईकिल लावारिस मिलने पर रघुवीर को चलाने के लिए बोलता है ताकि जब तक उसका मालिक
उसे लेने ना आए, साईकिल भी पड़ी-पड़ी खराब ना हो जाए और रघुवीर
को भी आने में कोई समस्या ना आए |
शुक्ल ने मध्यमवर्गीय
जीवन के सीमित सपनों, संतोषी जीवन एवं सुखी परिवार
को सुंदर चित्रात्मक रूप से प्रस्तुत किया है जिससे कोई शिकायत, रंजीश, दुख या पीड़ा नहीं है |
शुक्ल ने प्रकृति का अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत किया है अत: पूरा उपन्यास दीवार में
उस खिड़की के बाहर की प्रकृति एवं हाथी के इर्द-गिर्द घूमता है | एक बहुत ही शांत जीवन का सफर है – ये उपन्यास |
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