गुरुवार, 28 मई 2026

खुद की ही बात

जब बैठती हूँ तन्हां मैं
खुद से खुद की ही बात करती हूँ,
बदले मौसम की तरह वक्त को
सामने रख हिसाब करती हूँ।

सपना मिला ना ही मोहब्बत
अपने दर्द का कारण ढूंढती हूँ,
मिली जिसे मैं ना,
वो है परेशान या मैं, ये सोच
खुद को आईने में बार-बार देखती हूँ।

एक सपना था कि
उडू आसमाँ में,
अपने पंखों के वो निशान खोजती हूँ
पर खुद को पिंजरे की जकड़ में देखती हूँ।

मिलना, बिछड़ना तो चलता है संसार में
मैं बस मिलन का अहसास खोजती हूँ,
घूमेगा पहिया एक दिन मेरा भी
उस दिन का इंतजार करती हूँ।

खुद को आईने में बार-बार देखती हूँ,
अपने होने की बस वजह ढूंढती हूँ।

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