रविवार, 10 अप्रैल 2022

देह

है पंचतत्व से बना देह,
पल में ही मिट जाता है,
जीवन के आने जाने में,
क्यूं तू अपना मन लगाता है।

है आत्मतत्व बस एक ही,
बाकी बदलता जाता है,
है अमरत्व ही लक्ष्य सभीका,
फिर क्यूं भटकता जाता है।

ये तेरा है ये मेरा है पर,
देह भी ना तेरा है,
जिसके लिए तू लड़ता है,
वो तो मोक्ष प्राप्ति को तरसता है।

मोह माया सब क्षणिक है,
परमतत्व ही मंजिल है,
यूं ना खो इस जीवन को,
ये अमूल्य क्षणों की डोरी है।

दया, करुणा और प्रेम,
मानव से तू कर स्नेह,
सब यही धरा रह जाएगा,
तू वापिस ना आ पाएगा।

जीवन के आने जाने में,
क्यूं तू अपना मन लगाता है।
यह पंचतत्व से बना देह,
पल में ही मिट जाता है।

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