जिनकी राह पता नहीं,
मंजिल पता है
पर कदमों पर यकीं नहीं।
कैसे मिलेगा वो मुझे
जब उसका पता ही,
मुझे पता नहीं
हवाओं से पूछ बैठा तो
बोला- तुझे तो खुद का
भी पता, पता नहीं।
ये सोच हैरत में हूँ मैं
पर तुझे कभी मैं
भूली नहीं,
सामने नहीं तो
सपने में ही सही
तुझसे मैं मिलूंगी ।
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