रविवार, 12 अक्टूबर 2025

अपना कौन

सपना एक मध्यम वर्गीय परिवार की इकलौती लड़की थी जिसका एक भाई था।  सपना के सपने बहुत बड़े थे पर उसे कैसे सही है इसकी उसे सही जानकारी नहीं थी। उसके पिता एक दवाईयों की दुकान पर काम करते थे और रात में शराब पीकर रोज घर पर हंगामा करते थे।
उसके पिता सपना से बहुत प्यार करते थे, पर सपना के भविष्य को लेकर उनकी कोई कोई सोच या कोई चिंता नहीं थी।
सपना और उसके भाई ने खुद से बहुत मेहनत की जिसमें उसकी मां ने हरकदम उनका साथ दिया। उन तीनों की मेहनत रंग लाई और दोनों भाई बहन को अच्छी नौकरी मिल गई। सपना की शादी एक शिक्षित परिवार में हो गई, अब मां को अपनी बेटी के भविष्य की सारी चिंताएं समाप्त हो गई।
पर दूसरी ओर शादी के बाद भी अपना का संघर्ष नहीं रुका। उसके पति ने अपने परिवारवालों की बेफिजूल बातों में आकर अपना और उसके तीन साल के बेटे को छोड़ दिया। सपना बहुत हिम्मत वाली लड़की थी पर सुंदर, सुशील और कमाऊ होने के बाद भी वह स्वयं को लाचार महसूस करती थी।
इसी बीच उसके पिता की मौत हो गई। सपना के पास अपने बच्चे की परवरिश के लिए अपनी नौकरी का साथ था, अपने दोहरी जिम्मेदारियों के बीच अक्सर उसे अपना कहने वाले एक रिश्ते का भी साथ नहीं मिला था। सपना की परेशानियों से खुद को बचाते हुए उसके भाई भाभी ने उससे अपने सारे रिश्ते खत्म कर लिए ताकि कहीं वो उन पर बोझ ना बन जाए। उसकी मां चाहकर भी उसके लिए कुछ नहीं कर पा रही थी, बस एक मौन होकर अपने सभी फर्ज निभा रही थी।
सपना अपने बच्चे के साथ अपनी जिंदगी जी रही थी और उसी में अपने सारे रिश्ते और खुशियां ढूंढ रही है। पर एक प्रश्न हमेशा उसे परेशान करता था कि आखिर एक लड़की का अपना कौन है? वो जो उसे पैदा करता है या वो जो उसे उसके मां बाप से मांगकर, उसे हर खुशी का वचन देकर, अपने साथ ले जाता है या वो जिसे वो पैदा करती है।
असल में एक स्त्री का जीवन एक धरोहर है जो माता पिता उसके पति के लिए संभाल कर रखते है और ससुराल वाले अपना वंश आगे बढ़ाने के लिए। उसका अपना वजूद कुछ नहीं होता, बस वो एक कठपुतली की तरह चलाई जाती है। आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाकर वो वित्तीय रूप से सक्षम हुई है, मानसिक रूप से अब भी वो पराधीन है। 
अपनेपन और पराया धन के बीच सपना की असली पहचान वो खुद है। यह जानने और इसे पाने तक पहुंचना ही एक स्त्री के संघर्ष की वास्तविक जीत है।

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