अक्सर खुद से ये
सवाल पूछती हूँ मैं,
बस खुद के अक्स को देख
क्यूं नहीं मुस्कुरा
पाती हूँ मैं।
जो पाया
वो चाहा ही नहीं,
और जो चाहा
वो मिला ही नहीं।
है हसीन मुस्कुराहट
ये कहता है जमाना
पर खुद से खुद को
मैं झूठ बोल पाई ही नहीं।
धुंधला चुकी है
अब तस्वीर भी तेरी,
यादों को मैं खुद में
मिटा पाई ही नहीं।
बस इसीलिए खुद को देख
मैं मुस्कुरा पाई ही नहीं।
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